भारत में भिक्षावृत्ति (Beggary in India)

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री द्वारा भिक्षावृत्ति पर एक नया व्यापक कानून बनाने की आवश्यकता पर बल
दिया गया है।

वर्तमान स्थिति

  • वर्तमान में भिक्षावृत्ति और अभावग्रस्त व्यक्तियों (destitutes) के लिए कोई केंद्रीय कानून नहीं है और अधिकतर राज्यों ने
    बम्बई भिक्षावृत्ति रोकथाम अधिनियम, 1959 को अपनाया हुआ है।
  • भिक्षावृत्ति भारत के 21 राज्यों (उत्तराखंड सहित, जिसमें हाल ही में भिक्षावृत्ति को प्रतिबंधित किया गया है) और दो केंद्र शासित प्रदेशों में एक अपराध है। इसे संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध माना जाता है।
  • 2013 में अभावग्रस्त व्यक्ति (प्रशिक्षण, समर्थन और अन्य सेवाएँ) विधेयक नामक एक मसौदा तैयार किया गया तथा इसे महाराष्ट्र सरकार को सौंपा गया था। इस विधयेक में अभावग्रस्तता को अत्यधिक संवेदनशील परिस्थितियों के रूप में मान्यता प्रदान की गयी। इसके साथ ही अभावग्रस्त व्यक्तियों के प्रति संवैधानिक कर्तव्य तथा उनकी संवेदनशीलताओं को संबोधित करने का भी प्रावधान किया गया।
  • 2016 में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने निराश्रित व्यक्तियों के लिए अभावग्रस्त व्यक्ति (संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास) मॉडल बिल 2016 नामक एक नया मसौदा प्रस्तुत किया।
  • हालांकि, हाल ही में केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में जवाब देते हुए अपने एक साल पहले के विचार से यू-टर्न लेते हुए कानून के जरिए भिक्षावृत्ति को आपराधिक श्रेणी से हटाने का प्रस्ताव त्याग दिया।

बम्बई भिक्षावृत्ति रोकथाम अधिनियम, 1959

  • यह भिक्षावृत्ति को एक सामाजिक मुद्दे के बजाय अपराध के रूप में स्वीकार करता है। कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसके पास “निर्वाह का
  • कोई प्रत्यक्ष साधन” नहीं है तथा सार्वजनिक स्थान पर वह “घुमक्क्ड ” के रूप में भटकता है, तो उसे भिखारी माना जा सकता है। भिक्षावृत्ति के लिए किसी व्यक्ति को कम से कम एक वर्ष की अवधि और दूसरी बार अपराध के लिए 10 साल तक की अवधि के लिए हिरासत में लिया जा सकता है।
  • न्यायालय उन सभी लोगों को भी हिरासत में लेने का आदेश दे सकता है जो कि भिक्षावृत्ति करने वाले व्यक्ति पर निर्भर हैं।

वर्तमान कानूनों से सम्बंधित मुद्दे

  • पुलिस की शक्तियाँ- यह कानून पुलिस को किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है। इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता है तथा राज्य अधिकारियों को किसी व्यक्ति को भिक्षुक घोषित करने और बिना परीक्षण (ट्रायल) के उन्हें कैद करने की शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं।
  • भिक्षुक और बेघर के बीच कोई भेद नहीं- यह न केवल गरीब भिखारियों को बल्कि दिव्यांग व्यक्तियों, छोटे पुस्तक विक्रेताओं, कूड़ा बीनने वाले, गायन, नृत्य इत्यादि द्वारा थोड़े बहुत पैसे कमाकर जीवनयापन कर रहे व्यक्तियों को भी शामिल कर लेता
  • बाल न्याय अधिनियम, 2015 से विरोधाभास- यह कानून बाल भिखारियों को “देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों” के रूप में स्वीकारता है। इसके अंतर्गत बाल कल्याण समितियों के माध्यम से समाज में उनके पुनर्वासन और समावेशन का प्रावधान किया गया है। जबकि भिक्षावृत्ति कानून में इसे अपराध माना गया है।
  • संवैधानिक अधिकार- संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक भिखारी या किशोर या आश्रित रहने वाले व्यक्ति को जीवन जीने का मौलिक अधिकार है। भिक्षावृत्ति उन लोगों के जीवन निर्वाह के साधनों में से एक है और इसे तभी समाप्त किया जाना चाहिए जब इसके स्थान पर अन्य विकल्प उपलब्ध हों।
  • विभिन्न परिभाषाएँ- उदाहरण के लिए- कर्नाटक और असम में भिखारियों की परिभाषा से धार्मिक साधुओं को बाहर रखा गया है जबकि तमिलनाडु में गली के कलाकारों, कवि, बाजीगर और सड़क के जादूगरों को भिक्षावृत्ति कानून से बाहर रखा
    गया है।

अभावग्रस्त व्यक्ति (संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास) मॉडल बिल 2016 में किए गए परिवर्तन

  • अधिकार आधारित दृष्टिकोण- यह अभावग्रस्त व्यक्तियों को राज्य से सहायता प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है। •
  • भिक्षावृत्ति को दोषमुक्त करना- यह अपराधों के दोहराव के अतिरिक्त भिक्षावृत्ति को क़ानूनी बनाता है। इसमें अभावग्रस्त
    व्यक्तियों को अपराधी मानने के बजाय, उन लोगों पर कठोर कार्यवाही का प्रावधान किया गया है जो लोग संगठित भिक्षावृत्ति व्यवसाय समूह चलाते हैं।
  • अभावग्रस्त व्यक्तियों की पहचान करना- प्रत्येक जिले में भ्रमण करने वाली या सुगम्य इकाइयों की स्थापना के माध्यम से
    अभावग्रस्त व्यक्तियों की श्रेणी में आने वाले लोगों की पहचान करना तथा उनकी सहायता करना।
  • भिक्षुकों का पुनर्वास करना- प्रत्येक जिले में योग्य डॉक्टरों, मनोरंजन और अन्य सुविधाओं से युक्त पुनर्वास केंद्रों के माध्यम से
    भिक्षुकों का पुनर्वास करना बिहार जैसे कुछ राज्यों द्वारा ऐसे कार्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं।
  • रेफरल(सम्प्रेषण) समितियों की स्थापना- अभावग्रस्त व्यक्तियों की जरूरतों की पहचान करते हुए उनकी आवश्यकता के
    अनुसार संबंधित संस्थानों जैसे चिकित्सा सेवाओं, आश्रय, रोजगार के अवसर आदि तक उनकी पहुँच सुनिश्चित कराना।
  • परामर्श समितियों की स्थापना- उनके साथ बातचीत करना और उनकी वरीयताओं के अनुसार विशिष्ट व्यावसायिक प्रशिक्षण को अपनाने में उनकी सहायता करना। यह उनके कौशल में वृद्धि करेगा तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगा।
  • निगरानी और सलाहकार बोर्ड का गठन- योजनाओं के कार्यान्वयन में समन्वय और सरकार को परामर्श, संरक्षण, कल्याण
    और विधियों के पुनर्वास से संबंधित मुद्दों पर सलाह देने हेतु।

आगे की राह

राज्य को अभावग्रस्त व्यक्तियों (destitutes) के प्रति अधिक मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। एक ऐसे कानून की आवश्यकता है जो ऐसे व्यक्तियों को गरीबी के कारण दंडित करने के बजाय उनकी गरिमा का सम्मान करता हो। इस प्रकार मौजूदा भिक्षावृत्ति कानूनों को निरसित किया जाना चाहिए और लोक कल्याण तथा सामाजिक सुरक्षा कानूनों के साथ-साथ मनरेगा की तर्ज पर भिक्षुकों को रोजगार उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके अलावा निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए:

  • उनके अधिकारों के बारे में जागरुकता का प्रसार करना चाहिए जैसे कि गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार।
  • भिक्षुकों को स्मार्ट कार्ड और आधार संख्या प्रदान करना– जनगणना में आसानी से सम्मिलित करने, आसान ट्रैकिंग, सहजता से
    बैंक खाते खोलने और कम लागत वाली बीमा पॉलिसियाँ तथा उनके कल्याण के लिए नीतिगत योजनाओं हेतु।
  • डाटा बैंक का निर्माण- आगंतुक समितियों (विज़िटिंग कमेटी) के माध्यम से समय-समय पर इन संस्थानों में पुनर्वास, परामर्श
    संस्थान आदि की स्थिति को ट्रैक करने के लिए।
  • भिक्षुक गृह से बाहर आने के बाद समाजिक समावेशन में उनके द्वारा अनुभव की जा रही चुनौतियों का सामना करने में
    सहायता करने के लिए कौशल प्रशिक्षण।
  • व्यक्तियों और अधिकारियों को संवेदनशील बनाना – भीख माँगने के बारे में लोकप्रिय धारणा है कि यह आसानी से पैसा
    कमाने का पसंदीदा तरीका है। इसे बदलने और लोगों को उनकी परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है।
  • भोजन तक पहुंच- उन्हें भोजन का अधिकार अधिनियम के दायरे में लाने के लिए एक तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है।
  • सड़क पर भोजन और वस्त्रों को अपमानजनक तरीके से लोगों को देने के बजाय राज्य को भूख के लिए एक हेल्पलाइन प्रदान
    करनी चाहिए जिसके तहत किसी भी भूखे व्यक्ति को कहीं भी भोजन मिल सके।
  • सरकार को विभिन्न हितधारकों जैसे कि स्ट्रीट चिल्ड्रेन के लिए कार्य करने वाले गैर-सरकारी संगठनों, यातायात पुलिसकर्मियों आदि को शामिल करके कार्य करना चाहिए।

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Thanks for visiting IASbook