जलवायु परिवर्तन (Climate Change)

NASA के अनुसार, जलवायु परिवर्तन मुख्यतः जीवाश्म ईंधन को जलाने से उत्पन्न हुई वैश्विक परिघटनाओं की एक विस्तृत श्रृंखला है। जो पृथ्वी के वायुमंडल में ऊष्मा अवशोषक गैसों में वृद्धि करती है। इन परिघटनाओं के अंतर्गत वैश्विक तापन के कारण उत्पन्न हुई तापमान में वृद्धि की प्रवृतियाँ शामिल हैं। इसके अतिरिक्त इनमें समुद्री जल स्तर में वृद्धि, ग्रीनलैंड, अंटार्कटिका, आर्कटिक के हिमावरण और विश्व भर में पर्वतीय हिमनदों में कमी, फूल/पौधों के प्रस्फुटन के समय में परिवर्तन और चरम मौसमी परिघटनाओं जैसे परिवर्तन शामिल हैं। संयुक्त

राष्ट्र एमिशन गैप रिपोर्ट – 2017 (UN Emission Gap report, 2017) के अनुसार, ग्रीनहाउस गैसों (GHG) की वृद्धि दर विगत कुछ वर्षों में घट गई है, हालांकि GHG के कुल उत्सर्जन में निरंतर वृद्धि अभी भी जारी है।

स्टेट ऑफ़ ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट – 2017

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organisation: WMO) द्वारा स्टेट ऑफ़ ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट – 2017 (State of Global Climate Report 2017) जारी की गई है, जिसमें निम्नलिखित अवलोकनों को रेखांकित किया गया है:

  • 2016 के पश्चात वर्ष 2017 को दूसरे सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया था और यह सबसे गर्म नॉन-अलनीनो वर्ष था।
  • 2013-17 के दौरान रहे औसत तापमान को रिकॉर्ड में मौजूद पांच वर्षों के औसतों में सबसे गर्म माना गया था।
  • 2017 में जलवायु संबंधी परिघटनाओं के कारण होने वाली आपदा सम्बन्धी कुल वैश्विक हानि लगभग 320 बिलियन अमेरीकी
    डॉलर थी, इस कारण 2017 को सबसे महंगे वर्ष के रूप में दर्ज किया गया था।
  • 2017 का वैश्विक समुद्री सतही तापमान तीसरा सबसे गर्म सतही तापमान निर्धारित किया गया, क्योंकि यह तापमान 2015 और
    2016 के स्तर की तुलना में कुछ कम रहा था। क्रायोस्फेयर निरंतर सिकुड़ रहा है, आर्कटिक और अंटार्कटिक की समुद्री हिम औसत मात्रा से कम हो गई है।

क्रायोस्फीयर

पृथ्वी के जल का जमा हुआ भाग है जिसके अंतर्गत ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका क्षेत्र की महाद्वीपीय आइस शीटस के साथ-साथ हिम टोपियों, हिमनदों और हिम क्षेत्र एवं पर्माफ्रॉस्ट को शामिल किया जाता है। इसके अतिरिक्त महासागरों के जमे हुए भाग जैसे अंटार्कटिका और आर्कटिक के आस-पास का समुद्र और जमी हुई नदियाँ एवं झीलें (जो मुख्य रूप से ध्रुवीय क्षेत्रों में अवस्थित हैं) भी इसमें शामिल हैं।

  • महासागरों के अम्लीकरण की प्रक्रिया निरंतर जारी है। 1980 के दशक के प्रारंभ में समुद्री जल का pH मान 8.10 से अधिक था जो निरंतर कम हो रहा है और घटकर पिछले पांच वर्षों में 8.04 और 8.09 के मध्य रह गया है।

GHG की सांद्रता से जुडी प्रवृत्तियाँ:

  • वर्तमान में वायुमंडलीय CO2 की सांद्रता पूर्व-औद्योगिक काल (1750 से पहले) के स्तर से 145% अधिक हो गई है। । । इसमें वृद्धि का कारण मानवीय गतिविधियों और प्रबल एल नीनो परिघटना का संयोजन है।
  • दूसरा कारण चीन के उत्सर्जन में वृद्धि है, जिसमें दो वर्ष की कमी के पश्चात 2017 में 3.5 प्रतिशत की दर से वृद्धि का
    अनुमान लगाया गया है।
  • जीवाश्म ईंधन के उपयोग और सीमेंट उत्पादन के कारण होने वाला वैश्विक CO2 उत्सर्जन 2016 में भी निरंतर दूसरे वर्ष
    स्थिर रहा।
  • वायुमंडलीय मीथेन एक नए उच्च स्तर पर पहुंच गई है तथा वर्तमान में इसकी सांद्रता पूर्व-औद्योगिक स्तर की 257% है।
    2016 में वायुमंडल में NO2 की सांद्रता 328.9 पार्ट्स पर बिलियन थी जो पूर्व-औद्योगिक स्तर का 122% है।

जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारक

  • प्राकृतिक कारक: पृथ्वी की जलवायु कई प्राकृतिक कारकों से प्रभावित हो सकती है। इनमें प्रमुख हैं – महाद्वीपीय प्रवाह, ज्वालामुखी, महासागरीय धाराएँ, पृथ्वी का अपने अक्ष पर झुकाव तथा धूमकेतु एवं उल्कापिंड। प्राकृतिक कारक दीर्घकाल के लिए
    जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करते हैं और हजारों से लाखों वर्षों तक बने रहते हैं।
  • मानवजनित कारक: मानवजनित या मानव निर्मित कारकों का परिणाम अल्पकालिक जलवायु परिवर्तन होता है। इसमें पृथ्वी के
    ऊर्जा संतुलन में परिवर्तन शामिल हैं अर्थात् वायुमंडलीय प्रणाली में परिवर्तन जो मौसम और जलवायु में परिवर्तन को बढ़ावा देता है। मानवजनित परिवर्तन GHG उत्सर्जन में वृद्धि या वनों की कटाई, शुष्क भूमि पर सिंचित कृषि आदि के माध्यम से भूमि उपयोग में परिवर्तन के द्वारा हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन और भारत

  • IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change: IPCC) के अनुसार भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के लिए
    अत्यधिक सुभेद्य है। यह परिस्थिति स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और खाद्य सुरक्षा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रही है।
  • 2017 के क्लाइमेट चेंज परफॉरमेंस इंडेक्स (Climate Change Performance Index: CCPI) में भारत को 56 देशों में से
    14वां स्थान प्राप्त हुआ था, यह ध्यान देने योग्य है कि निम्न प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और ऊर्जा के अधिक स्वच्छ स्रोतों को अपनाने के कारण भारत का उत्सर्जन स्तर 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य से पर्याप्त रूप से नीचे है। हालांकि, विगत वर्ष के दौरान कुल उत्सर्जन में अपेक्षाकृत तीव्रता से वृद्धि हुई है, जिसने सूचकांक में भारत के सुधार की संभावनाओं को कम कर दिया है।
  •  भारत को एनवॉयरन्मेंटल परफॉरमेंस इंडेक्स में 180 देशों में से 177वां स्थान प्राप्त हुआ है, जो अत्यधिक जनसंख्या दबाव और
    तीव्र आर्थिक विकास के पर्यावरण पर प्रभाव को दर्शाता है।

भारत में CO2 उत्सर्जन की प्रवृत्ति

  • भारत के CO2 उत्सर्जन में विगत दशक में औसतन 6% प्रति वर्ष की तुलना में इस वर्ष केवल 2% की वृद्धि की सम्भावना है।
  • यह निम्न वृद्धि दर अल्पकालिक ही है, क्योंकि यह निर्यात में कमी, निम्न उपभोक्ता मांग और विमुद्रीकरण के कारण मुद्रा संचलन में
    एक अस्थायी गिरावट से संबंधित है।
  • भारत उन कुछ देशों में से एक है जो पेरिस समझौते के तहत स्वयं द्वारा निर्धारित जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अपनी
    वर्तमान नीतियों के साथ सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत का कार्बन स्टॉक लगभग 7 अरब टन है, जो लगभग 25.66 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर है। लगभग 65% कार्बन स्टॉक मृदा में तथा 35% वृक्षों में संगृहीत है।

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