महिलाओं के विरुद्ध अपराध(Crime Against Women)

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भारत में महिला सुरक्षा (Women Safety in India)

गृह मंत्रालय द्वारा महिला सुरक्षा से संबंधित मुद्दों का व्यापक तरीके से समाधान करने हेतु संबंधित मंत्रालयों/विभागों और राज्य सरकारों के सहयोग से एक नए प्रभाग का गठन किया गया है।

इसके साथ ही यह नया प्रभाग निम्नलिखित विषयों के संबंध में भी कार्य करेगा:

  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध अपराध।
  • बच्चों, वृद्ध व्यक्तियों के विरुद्ध अपराध।
  • तस्करी-रोधी प्रकोष्ठ।
  • जेल कानून और जेल सुधार से संबंधित मामले।
  • निर्भया कोष के तहत सभी योजनाएं।
  • अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम (CCTNS)

भारत में महिला सुरक्षा

  • महिला सुरक्षा में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, बलात्कार, वैवाहिक बलात्कार, दहेज, एसिड अटैक जैसे विभिन्न मुद्दे
    सम्मिलित हैं।
  • 2010 में आरंभ संयुक्त राष्ट्र के ‘सेफ सिटीज एंड सेफ पब्लिक स्पेस’ कार्यक्रम के अनुसार विश्व के शहर महिलाओं के लिए
    असुरक्षित बनते जा रहे हैं।

वर्ष 2016 के लिए NCRB के नवीनतम आँकड़ों के अनुसार,

  • समग्र रूप से महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में लगभग 3% और बलात्कार की घटनाओं में 12% की वृद्धि हुई है।
  • महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के रूप में वर्गीकृत मामलों में से अधिकांश दर्ज हुए मामले ‘पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा
    क्रूरता’ (32.6%) से संबंधित थे। यह निजी स्थलों या घर में महिलाओं की सुरक्षा की एक धूमिल छवि को प्रदर्शित करता है।

सुरक्षा चिंताओं को दर्ज न कराने के सामान्य कारण:

  • समझ का अभाव: अधिकांश महिलाओं की धारणा है कि उनके प्रति किसी का गलत आचरण, उनके आगे आने और शिकायत दर्ज कराने हेतु पर्याप्त गंभीर कारण नहीं है।
  • शिकायत प्रक्रिया में विश्वास की कमी: उनका मानना है कि प्रक्रिया अपमानजनक और कठिन हो सकती है।
  • सामाजिक कलंक: समाज में अपमानित होने का भय।
  • प्रतिशोध का भय: उत्पीड़नकर्ता द्वारा। 
  • पदोन्नति और करियर विकास पर नकारात्मक प्रभाव का भय।
  • इस प्रकार की घटनाओं को दर्ज कराने में परिवार की अनिच्छा क्योंकि अधिकांशतः अपराधी पीड़िता का परिचित होता है।

महिला सुरक्षा के प्रयासों के समक्ष विद्यमान चुनौतियां:

  • रिपोर्टिंग का अभाव: महिलाओं के लिए एक सुरक्षित परिवेश के निर्माण हेतु इसे एक प्रमुख अवरोधक के रूप में माना जाता  है।
  • धीमी आपराधिक न्याय प्रणाली: मामलों की जांच और निपटान में लंबा समय लगता है जिससे अपराधियों को बढ़ावा मिलता है।
  • अपर्याप्त क्रियान्वयन: कई नियोक्ताओं द्वारा अभी भी आंतरिक शिकायत समिति की स्थापना नहीं की गयी है जो कानून का स्पष्ट उल्लंघन है।
  • कानून प्रवर्तन एजेंसियों जैसे पुलिस, न्यायपालिका इत्यादि में लैंगिक संवेदनशीलता की कमी।
  • शिक्षा का स्तर/निरक्षरता, निर्धनता, विभिन्न सामाजिक रीति-रिवाज एवं मूल्य, धार्मिक मान्यताएं, सामाजिक मानसिकता जैसे विभिन्न सामाजिक कारक भी चुनौतियां उत्पन्न करते हैं।
  • तर्कहीन शिकायतें: ये शिकायतें अधिकांशतः घरेलू हिंसा अधिनियम के संदर्भ में देखी जाती हैं।
  • प्रौद्योगिकी के कारण अपवर्जन: यद्यपि प्रौद्योगिकी कुछ तरीकों से सार्वजनिक सुरक्षा में वृद्धि में सहायक होती है। परंतु इसका दायरा अभी तक सीमित है क्योंकि जिन महिलाओं की स्मार्टफोन तक पहुँच नहीं है वे इसका लाभ नहीं उठा पातीं हैं।
  • महिला विकास के समक्ष अवरोध: उदाहरण के लिए, भारत में महिलाओं की निम्न श्रमबल भागीदारी दर के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को माना जाता है। भारत के सार्वजनिक क्षेत्र में पुरुष प्रभुत्व प्रकृति की पहचान तो की जा रही है किन्तु इसे चुनौती नहीं दी जा रही।

सरकार द्वारा उठाए गए कुछ कदम

 कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के लिए: इस हेतु निम्नलिखित प्रावधान किये गए हैं।

  • उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी विशाखा दिशा-निर्देश जो नियोक्ताओं के लिए कुछ उपाय करना आवश्यक बनाते हैं;
  • कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, निषेध एवं निदान) अधिनियम, 2013; तथा
  • महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा ऑनलाइन शिकायत के लिए ‘शी बॉक्स’ नामक प्लेटफॉर्म।

बलात्कार के मामलों के लिए:

  • 16-18 वर्ष की आयु के बीच के किशोरों द्वारा गंभीर अपराध करने पर उनके साथ वयस्क के समान व्यवहार करने के न्यायमूर्ति वर्मा समिति के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया है। हाल ही में, सरकार ने पॉक्सो अधिनियम 2012 में संशोधन किया है जिसके अनुसार 12 वर्ष से कम आयु की बालिका के साथ बलात्कार करने वाले व्यक्ति को मृत्यु दंड दिया जाएगा।
  • घरेलू हिंसा के लिए: घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 और IPC की धारा 498A पति या रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली क्रूरता से संबंधित है।
  • अन्य पहले: स्वाधार: कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन करने वाली महिलाओं के लिए एक योजना; GPS ट्रैकिंग; ‘पैनिक बटन’ इत्यादि।
  • सरकार मंत्रालयों और विभागों द्वारा किये जा रहे विनिर्दिष्ट कार्यों को सुनिश्चित करने के लिए महिला सुरक्षा पर एक समर्पित राष्ट्रीय मिशन स्थापित करने की योजना बना रही है।

आगे की राह

  • आपराधिक न्यायिक प्रणाली को सुदृढ़ बनाना: कानूनों का कठोर प्रवर्तन, विशेष फास्ट ट्रैक न्यायालयों की स्थापना, अभियोजन प्रणाली को सुदृढ़ बनाना, लोक अदालत जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को सुदृढ़ बनाना, राष्ट्रीय महिला नीति, 2016 के मसौदे को सिद्धांत और व्यवहार में लागू करना आदि।
  • उत्पीड़न तथा अनुचित आचरण एवं परिस्थिति जैसे किसी भी मुद्दे के मामले में महिलाओं को आगे आने और संगठन में संबंधित समिति के समक्ष अपनी शिकायत को रखने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए भी प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
  • कानून प्रवर्तन एजेंसियों, विशेष रूप से पुलिस और न्यायपालिका में आवधिक प्रशिक्षण के माध्यम से लैंगिक संवेदनशीलता को सुनिश्चित करना और साथ ही कॉर्पोरेट कंपनियों में लैंगिक-संवेदनशीलता को सुनिश्चित करने हेतु प्रशिक्षण आरम्भ करना।
  • घरेलू हिंसा से निपटने के लिए समुदाय-आधारित रणनीति का विकास करना और अपराधों की जांच हेतु महिला सुरक्षा समिति एवं महिला राज्य समिति जैसी सामुदायिक पुलिसिंग पहलों को प्रारम्भ करना।
  • कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के किसी भी रूप के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस नीति को अपनाया जाना चाहिए। इसे संगठन की विभिन्न नीतियों और सिद्धांतों यथा संगठन की आचार संहिता में सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  • समाज के सभी वर्गों के सहयोग से सिविल सोसाइटी को विभिन्न जमीनी स्तर के आंदोलन प्रारम्भ करने चाहिए।
  • ‘पिंजरा तोड़’ और ‘वन बिलियन राइजिंग’ जैसे कई आंदोलन महिला सुरक्षा हेतु बॉटम अप एप्रोच अपनाकर महत्वपूर्ण योगदान दे रहे
  • नैतिक शिक्षा: जागरूकता और शिक्षा के माध्यम से लोगों की मानसिकता का नैतिक पुनरुत्थान करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act)

उच्चतम न्यायालय ने रेखांकित किया है कि घरेलू हिंसा अधिनियम, जिसके द्वारा किसी सम्बन्ध में महिला से दुर्व्यवहार किये जाने वाले पुरुषों को दंडित किये जाने का प्रावधान किया गया है; सभी महिला-पुरुष संबंधों तक विस्तृत होता है एवं
तलाकशुदा महिलाओं को उनके पूर्व पतियों से भी संरक्षण प्रदान करता है।

तथ्यात्मक आंकड़े:

  • महिलाओं का परिवार के अन्दर ही अधिक शोषण होता है।
  • “पति और रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली क्रूरता” जैसे अपराधों का हिस्सा महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों के सभी पंजीकृत मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा (सभी मामलों में से 36%) था।
  • अपराध का दूसरा बड़ा वर्ग महिलाओं का शील भंग करने के उद्देश्य से किए जाने वाले अपराधों का था।
  • महिलाओं के खिलाफ किए जाने वाले कुल अपराधों में ऐसे अपराधों का हिस्सा 26 प्रतिशत था। महिलाओं के बलात्कार, अपहरण और शारीरिक हमले में वृद्धि।
  • बलात्कार -2014 में, सभी पीड़ितों में से 44 प्रतिशत लगभग 18-30 वर्ष के आयु वर्ग के थे, जबकि प्रत्येक 100 पीड़ितों में से
    एक छह साल से कम उम्र की थी।

घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act: DVA) में परिवर्तन

घरेलु हिंसा अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट ने ‘वयस्क पुरुष’ (adult male) शब्द वाले प्रावधान को हटा दिया है ताकि एक महिला
दूसरे महिला के विरुद्ध भी घरेलू हिंसा जैसे अपराधों का आरोप लगा सके।

न्यायालय का तर्क

  • चूँकि घरेलु हिंसा जैसे कृत्य करने तथा इस प्रकार की हिंसा के लिए उकसाने वाले अपराधी महिला भी हो सकती है अतः उनको संरक्षण देना इस अधिनियम के उद्देश्य को विफल कर सकता है। एक प्रकार से मूल अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत महिलाओं तथा अल्पवयस्कों को घरेलू हिंसा जैसे अपराध बिना किसी कानूनी कार्रवाई के भय के अंजाम दे सकने की छूट मिली हुई थी।
  • यह समान परिस्थितियों में स्थित व्यक्तियों के बीच भेदभाव करता है और इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन
    करता है।

परिवर्तन का महत्व

  • यह घरेलू हिंसा अधिनियम को लैंगिक रूप से तटस्थ बनाता है, जो कुछ विशेषज्ञों (फैसला देने वाले न्यायाधीशों सहित) के
    अनुसार (यह परिवर्तन) कानून के उद्देश्य को बेहतर तरीके से प्राप्त करने में मदद करेगा।
  • इस सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया गया है कि अधिनियम के बदलाव का उपयोग पति अपनी पत्नियों के विरुद्ध काउंटर केस दर्ज करने के लिए कर सकते हैं, तथा इस कार्य के लिए वे अपनी माता या बहनों को माध्यम बना सकते हैं।
  • इस अधिनियम के तहत किशोरों को भी शामिल करने के प्रावधान पर प्रश्न उठाया गया है। घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत इस सन्दर्भ में कोई आपराधिक प्रावधान नहीं है और इस तरह ऐसे मामले में किशोर न्याय बोर्ड का सामना करने का कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता है।
  • घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत राहत पूर्णतः वित्तीय रूप में प्रदान किया जाना निर्धारित किया गया है। जैसे- रखरखाव, मुआवजा और वैकल्पिक आवास; जिसे केवल एक वयस्क के खिलाफ दावा करके ही प्राप्त किया जा सकता है।

हाल में हुए बदलाव

  •  घरेलू हिंसा की परिभाषा को संशोधित किया गया है– इसमें शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार या
    दुर्व्यवहार की धमकी तथा महिला या उसके रिश्तेदारों को अवैध दहेज मांगों के जरिए उत्पीड़ित करना शामिल किया गया
    है।
  • महिला शब्द की व्याख्या का विस्तार किया गया है। अब इस अधिनियम में “लिव-इन पार्टनर”, पत्नियां, बहनों, विधवाओं,
    माताओं, एकल महिलाओं को कानूनी संरक्षण पाने का अधिकार होगा।
  • सुरक्षित आवास पाने का अधिकार यथा वैवाहिक या साझा घर में रहने का अधिकार, भले ही उस घर में उसका स्वत्व
    (मालिकाना) अधिकार हो या नहीं। यह अधिकार न्यायालय द्वारा पारित निवास संबंधी आदेश द्वारा सुरक्षित किया गया है।
  • घरेलू हिंसा के अभियुक्त को अपराध को और अधिक संगीन बनाने या घरेलू हिंसा से संबंधित अन्य कोई अपराध करने से रोकने के लिए न्यायालय संरक्षण संबंधी आदेश दे सकता है, जैसे कि पीड़ित की आवाजाही से संबंधित स्थानों पर अभियुक्त को जाने से प्रतिबंधित करना, पीड़ित के कार्यस्थल पर उसके प्रवेश को रोकना, पीड़ित के साथ संचार करने का प्रयास करने से रोकना, दोनों पक्षों द्वारा उपयोग की जाने वाली किसी भी संपत्ति को अलग करना आदि।
  • यह महिला को चिकित्सकीय जांच, कानूनी सहायता व सुरक्षित आश्रय प्रदान करने के लिए सुरक्षा अधिकारी तथा NGOs को नियुक्त करने का प्रावधान करता है।
  • अपराधियों को एक वर्ष की अधिकतम कारावास की सजा और 20,000 रुपये या दोनों में से एक का प्रावधान किया गया है।
  • प्रतिवादी द्वारा संरक्षण आदेश या अंतरिम संरक्षण आदेश का उल्लंघन करने को अधिनियम के अंतर्गत एक संज्ञेय और गैरजमानती अपराध के रूप में माना जायेगा। इसके लिए उसे कारावास (जो एक साल तक) या जुर्माना (जो 20,000 रूपये का
    आर्थिक दंड) या दोनों की सजा दी जा सकती है।
  • संरक्षण अधिकारी द्वारा इसका अनुपालन या अपने कर्तव्यों का निर्वहन न करने को भी इस अधिनियम में अपराध माना गया | है तथा इसके लिए भी उपर्युक्त वर्णित सजा के समान ही दंड का प्रावधान है।

सन्निहित कारण/ मुद्देः

  •  शहरी क्षेत्र- शहरी क्षेत्रों में एक कार्यशील महिला की अपने साथी की तुलना में अधिक आय, ससुराल वालों का उसके प्रति
    दुर्व्यवहार या उसकी उपेक्षा।
  • ग्रामीण क्षेत्र- ग्रामीण क्षेत्रों में कम आयु की विधवा स्त्रियों को हिंसा का अधिक सामना करना पड़ता है। अक्सर वे अपने पति
    की मृत्यु के लिए कोसी जाती हैं और उचित भोजन एवं कपड़ों से वंचित रखी जाती हैं। अधिकांश घरों में पुनर्विवाह के लिए उन्हें अनुमति प्रदान नहीं की जाती है या उन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाता है। एकल परिवार में परिवार के अन्य सदस्यों या पड़ोस में किसी के द्वारा महिलाओं से छेड़छाड़ और बलात्कार के प्रयास जैसी घटनाएँ होती हैं।
  • अन्य कारण- रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक मानसिकता- पुरुष वर्चस्व और महिलाओं पर नियंत्रण; आर्थिक कारण- दहेज की
    मांग, बांझपन या पुत्र प्राप्ति की इच्छा; शराब आदि।

घरेलू हिंसा अधिनियम की आलोचना / दुरुपयोग:

  • यह अधिनियम लैंगिक रूप से पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है और लिंग तटस्थ नहीं है।
  • झूठे मामलों की बढ़ती संख्या।
  • यह जीवन साथी द्वारा बलात्कार जैसे दुर्व्यवहारों को शामिल नहीं करता है।
  • मौखिक अपशब्दों और मानसिक उत्पीड़न जैसे दुर्व्यवहार में पीड़िता द्वारा व्यक्तिपरक व्याख्या की सम्भावना।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता का अभाव जबकि वहां इस तरह के कानूनों की अधिक आवश्यकता है।
  • गंभीर दुर्व्यवहार के मामलों में भी न्यायिक व्यवस्था मध्यस्थता और परामर्श का मार्ग अपनाती है। इसके अलावा कई बार पुरुष पुलिस अधिकारियों, सुनवाई के दौरान न्यायिक मजिस्ट्रेट आदि के द्वारा असंवेदनशीलता प्रदर्शित की जाती है।
  • पीड़ित महिलाओं के लिए आर्थिक, मनोवैज्ञानिक सहायता प्रणाली का अभाव।
  • राज्यों में अपर्याप्त बजटीय आवंटन- विभागों ने पहले से व्याप्त बोझ के कारण ‘संरक्षण अधिकारियों को नियुक्त नहीं किया है।

आगे की राह

  • घरेलू हिंसा से प्रभावित महिलाओं को सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
  • महिला सशक्तिकरण से संबंधित NGOs को घरेलू हिंसा से महिलाओं की रक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करना चाहिए।
  • मामलों का तीव्र निपटान करना।
  • PRIs को ऐसे मामलों के प्रति प्रगतिशील एवं सहानुभूतिपूर्ण भूमिका का निर्वहन करना चाहिए। इनके द्वारा घरेलू हिंसा को रोकने में भागीदारी भी की जानी चाहिए।
  • प्रत्येक चरण से संबंधित अधिकारियों को अधिक संवेदनशील प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
  • अधिक जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में।

यौन हमले के निर्धारण हेतु नये प्रतिमान (Determining Sexual Assault)

  •  यौन सहमति के मुद्दे पर पर दिल्ली उच्च न्यायालय के एक हालिया निर्णय से महिला की सहमति और बलात्कार के बीच
    अस्पष्ट अंतर के सन्दर्भ में कानूनी समुदाय में विभिन्न प्रकार के मत प्रकट किये गए हैं।
  • सोनीपत में बलात्कार के मामले में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय में भी सहमति का एक ऐसा ही
    मुद्दा उठाया गया था।
  • बलात्कार बुनियादी मानव अधिकारों के खिलाफ एक अपराध है और अनुच्छेद 21 में निहित जीवन के अधिकार का भी उल्लंघन करता है।
  • भारतीय दंड संहिता की धारा 375 और 376 में भारत में बलात्कार के अपराध का विवरण है।

उच्च न्यायालयों के निर्णय

  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने बलात्कार के आरोपी निर्देशक महमूद फारूक़ी को बरी कर दिया। उन्हें इस आधार पर बरी किया | गया कि उन परिस्थितियों में सहमति से इनकार स्पष्ट नहीं था तथा शिकायतकर्ता ने सिर्फ “मामूली (feebly)” विरोध किया
    था।
  • अभियुक्त को संदेह का लाभ दिया गया क्योंकि उसका बलात्कार करने का कोई इरादा नहीं था और यह स्पष्ट नहीं था कि महिला ने सहमति से इनकार कर दिया था।
  • इसके साथ ही, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पीडिता को एक “स्वच्छंद संभोगी रवैये और एक कामुक प्रवृत्ति” वाली
    स्त्री बताया और यह भी सुझाया कि अपराधियों के साथ युवा महिला सुविधाजनक स्थिति में रहती थी।

सहमति को परिभाषित करना

सहमति वह है जो बलात्कार से संसर्ग को पृथक करती है। हालांकि, सहमति ऐसी चीज है जिसे निर्धारित करना और साबित करना मुश्किल है, खासकर बलात्कार के मामलों में जहां कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है।

विभिन्न देशों में सहमति पर कानून

  • कैनेडियन क्रिमिनल कोड में कहा गया है कि सहमति स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए और स्वैच्छिक सहमति/ समझौते से कम कुछ भी पर्याप्त नहीं होगा (धारा 273)। यह आरोप साबित करने का भार आरोपी पर होता है कि उसने यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए कि नहीं कि पीड़िता सहमति दे रही है। UK के सेक्सुअल ऑफेंसेस एक्ट में भी ऐसा ही उल्लेख है।
  • ऑस्ट्रेलिया में भी, यौन उत्पीड़न के अपराधों पर निर्णय लेने के दौरान सहमति पर अधिक ध्यान दिया गया है और आरोपी पर भार दिया जाता है कि उसे साबित करना है कि उसने पीड़ित की सहमति ली है।
  • न्यायमूर्ति वर्मा समिति ने सहमति परिभाषित करने की आवश्यकता पर ध्यान दिया। समिति द्वारा दी गई परिभाषा को IPC
    में जोड़ा गया था।
  • इसके स्पष्टीकरण में कहा गया है कि सहमति का अर्थ एक स्पष्ट स्वैच्छिक समझौता होता है, जब महिलाएँ शब्दों, इशारों या
    किसी भी तरह के मौखिक या गैर-मौखिक संचार द्वारा किसी विशिष्ट यौन कृत्य में भाग लेने की इच्छा व्यक्त करती हैं।
  • इसके अलावा, उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में कहा गया है कि बलात्कार के अपराध को साबित करने के लिए, एक महिला को यह साबित करने की आवश्यकता नहीं है कि बलात्कार के कृत्य के दौरान उसके द्वारा सक्रिय विरोध किया गया
    था। इन कारकों की अनुपस्थिति यह इंगित नहीं करती है कि एक महिला ने सहमति दी है।

निर्णय के विरुद्ध तर्क

  • इस निर्णय के विरुद्ध यह तर्क दिया गया है कि यह बलात्कारियों को एक नई सुरक्षा प्रदान करेगा जो मौजूदा कानूनों में नहीं
    है। इस सन्दर्भ में दोहरी पूर्वधारणाएँ मौजूद हैं- बलात्कार के इरादे का अभाव (अभियुक्त द्वारा) और स्पष्ट ‘न’ के बावजूद
    महिला द्वारा अपनी इस भावना की स्पष्ट रूप से अभिव्यक्ति न करना।
  • इस फैसले से यौन कृत्य के लिए सहमति या इनकार साबित करने का भार महिलाओं पर डाल दिया गया।
  • इसके अलावा पंजाब उच्च न्यायालय ने युवा पीड़िता के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जो पीड़ित पर आरोप लगाने (विक्टिम ब्लेमिंग) की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है।

नाबालिग पत्नी से शारीरिक सम्बन्ध बनाना बलात्कार की श्रेणी में शामिल (Sex with a Minor Wife Amounts to Rape)

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाना बलात्कार की श्रेणी में आएगा।

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अनुसार – जब कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करता है तो उसे बलात्कार कहा जाता है। बलात्कार तब माना जाता है जब कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ निम्नलिखित छः परिस्थितियों में शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करता है:

  • उसकी इच्छा के विरुद्धः
  • उसकी सहमति के बिना;
  • उसकी सहमति के साथ; किन्तु यह सहमति उसे या उसके किसी प्रियजन को मृत्यु अथवा चोट पहुँचाने का भय दिखाकर, डरा
    धमकाकर ली गयी हो अथवा उसकी सहमति नकली पति बनकर ली गयी हो।

अपवाद – किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ बनाया गया शारीरिक सम्बन्ध बलात्कार नहीं है, यदि पत्नी की उम्र पंद्रह वर्ष या उससे कम न हो।

CrPC की धारा 198(6) के अनुसार- पत्नी की आयु पंद्रह वर्ष से कम होने पर भी कोई न्यायालय उस दशा में भारतीय दंड संहिता (1860 के 45) की धारा 376 के अधीन किसी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा, यदि शिकायत दर्ज कराने के समय इस अपराध को घटित हुए एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका हो।

पृष्ठभूमि

  • IPC के तहत, भले ही सहमति हो या न हो, 18 वर्ष से कम आयु की लड़की के साथ यौन संबंध बनाना अपराध है। हालांकि,
    उस दशा को अपवाद माना गया है जब लड़की आदमी की पत्नी हो, बशर्ते कि वह 15 वर्ष से कम न हो। इस प्रकार बलात्कार को विवाह में अनुमन्य माना गया।
  • वर्ष 1978 में, विवाह करने के लिए सहमति की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष निर्धारित की गयी थी। विधि आयोग ने अपनी 84 वीं रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की थी कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अंतर्गत शामिल एक विवाहित महिला की परिभाषा के लिए भी यह आयु 18 साल होनी चाहिए।
  • इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय ने इस सन्दर्भ में एक महिला की आयु के बारे में विभिन्न कानूनों का विश्लेषण किया और कहा कि एक विवाहित महिला के लिए सहमति की उम्र 15 वर्ष है जो कि मौजूदा कानूनों के साथसाथ संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नाबालिग के जीवन के अधिकार का भी उल्लंघन करती है।
  • हालांकि, सरकार ने अदालत से अनुरोध किया कि वह अपवाद के खंड में हस्तक्षेप न करे, क्योंकि परंपराओं को ध्यान में रखते हुए और सामाजिक मानदंडों को विकास की प्रक्रिया के साथ सुसंगत बनाते हुए ही इस आयु का प्रावधान किया गया था। इसके अलावा, सरकार के अनुसार यह भी संभावना हो सकती है कि इस तरह के कानून का दुरुपयोग पति को डराने धमकाने के लिए किया जाए।

भारत में बाल विवाह

2011 की जनगणना के अनुसार, 2011 में पिछले नौ साल की अवधि में 15.3 करोड़ (कुल महिलाओं का लगभग 20%) लड़कियाँ 18 वर्ष की आयु से पहले विवाहित हुईं।

पर्सनल लॉ

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ (मुस्लिम विवाह अधिनियम, 1939 के विघटन) के तहत, यदि 15 वर्ष से कम आयु की एक नाबालिग लड़की मुस्लिम कानून के तहत विवाहित हो जाती है, तो वह 18 साल की आयु प्राप्त करने से पहले विवाह के विघटन की एक डिक्री प्राप्त कर सकती है, बशर्ते विवाह वास्तविकता में परिणत न हुआ हो (शारीरिक सम्बन्ध न बना हो)।
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार, एक हिंदू लड़की तलाक के लिए याचिका दायर कर सकती है यदि उसका विवाह 15 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले हुआ हो और उसने पंद्रह वर्ष की आयु पूरी होने के पश्चात, किन्तु 18 की आयु पूर्ण होने से पहले, इस विवाह को अस्वीकृत कर दिया हो। इस दशा में यह मायने नहीं रखता कि वह विवाह वास्तविकता में परिणित हुआ है अथवा नहीं।

निर्णय के महत्वपूर्ण बिंदु

  • अदालत ने IPC की धारा 375 के उस अपवाद को निरस्त कर दिया जिसमें 15 से 18 वर्ष की आयु की एक लड़की के पति को उसके साथ बिना सहमति के शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए एक प्रकार की आच्छादित स्वतंत्रता (blanket liberty) प्रदान की गयी थी। यह प्रावधान एक विवाहित बालिका और एक अविवाहित बालिका के बीच एक कृत्रिम भेद पैदा करता था।
  • यह अपवाद एक बड़ी विसंगति बना रहा है, क्योंकि धारा 375 स्वयं ही यह प्रावधान करती है कि 18 वर्ष से कम आयु की | लड़की के साथ यौन संबंध, उसकी सहमति के साथ या उसकी सहमति के बिना, वैधानिक रूप से बलात्कार होता है।
  • हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 198(6), 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नियों के साथ बलात्कार के मामलों
    पर लागू होगी और इन मामलों में संज्ञान इस धारा के प्रावधानों के अंतर्गत ही लिया जाएगा।
  • यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस फैसले में जो भी कहा गया है, उसे “वैवाहिक बलात्कार” के सन्दर्भ में किसी भी प्रकार के
    प्रेक्षण के रूप में न देखा जाए।

प्रभाव

  • इस फैसले को बाल विवाह को शुरू से ही शून्य मानने (void ab initio) की घोषणा के प्रेरक के रूप में देखा जा सकता है। क्योंकि अदालत ने IPC की धारा 375 के अपवाद 2 और अन्य बाल संरक्षण कानूनों के बीच की इस दशकों पुरानी विसंगति को समाप्त कर दिया है।
  • इनमें बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम,1929, 2006 का बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA), बच्चों का लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम और बाल न्याय अधिनियम शामिल हैं, जो कि “बच्चों” को 18 वर्ष से कम उम्र के किसी व्यक्ति के रूप में परिभाषित करते हैं।
  • वैवाहिक बलात्कार की अपराधिकता के सन्दर्भ में भी इस निर्णय का असर होने की संभावना है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर संसद और अदालतों में व्यापक रूप से बहसें होती रहती हैं।

चिंताएँ

  • हालांकि बाल विवाह निषिद्ध है परन्तु यह भारत के नागरिक कानूनों के तहत स्वतः शून्य नहीं है। अदालत ने इस तथ्य की आलोचना की है कि PCMA ने बाल विवाह को केवल ‘शून्य घोषित किये जाने योग्य’ माना है, अर्थात, इस बात की जिम्मेदारी बाल-वधू पर थोप दी गयी है की वह अदालत जाये और अपने विवाह की शून्यता सिद्ध करे। अतः विभिन्न प्रकार की अनियमितताओं को दूर करने के लिए कानूनों में परिवर्तन और संशोधन किए जाने की आवश्यकता है।
  • एक नाबालिग लड़की के लिए, अच्छे स्वस्थ्य की उपलब्धता एक अधिकार है ताकि वह एक स्वस्थ महिला के रूप में विकसित हो सके। इसके लिए न केवल अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य की आवश्यकता होती है बल्कि अच्छे मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकता भी होती है; किन्तु बाल विवाह इसे सीमित कर देता है।

स्त्री अशिष्ट रूपण (निषेध) अधिनियम (IRWA), 1986 में प्रस्तावित संशोधन

[Amendments Proposed in Indecent Representation of Women (Prohibition) Act (IRWA), 1986]

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने IRWA में संशोधन का प्रस्ताव दिया है।

पृष्ठभूमि

  • सरकार ने विज्ञापनों, प्रकाशनों, लेखों, चित्रों,आंकड़ों या किसी अन्य तरीके से महिलाओं के अशिष्ट निरूपण को प्रतिबंधित
    करने के लिए स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986 को अधिनियमित किया था। यह अधिनियम भारत में महिलाओं के अपमानजनक निरूपण के खिलाफ कार्रवाई हेतु महिला आन्दोलनों की मांग के प्रत्युत्तर में लागू किया गया था।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत “स्त्री अशिष्ट रूपण” शब्द को धारा 2(c) में परिभाषित किया गया है। इस शब्द से किसी स्त्री की आकृति, उसके रूप या शरीर या उसके किसी अंग का, किसी ऐसी रीति से ऐसे रूप में चित्रण करना अभिप्रेत है जिसका प्रभाव अशिष्ट हो अथवा जो स्त्रियों के लिए अपमानजनक या निंदनीय हो, या जिससे लोक नैतिकता अथवा नैतिक आचार के विकृत, भ्रष्ट या उसकी क्षति होने की संभावना हो।
  • इस अधिनियम के लागू होने के बाद से अभी तक तकनीकी क्रांति के परिणामस्वरूप इंटरनेट, मल्टी-मीडिया मैसेजिंग, केबल टेलीविजन, ओवर-द-टॉप (OTT) सेवाओं और एप्लीकेशनों जैसे-स्काइप, वाइबर, व्हाट्सएप, चैट ऑन, स्नैपचैट, इंस्टाग्राम इत्यादि जैसे संचार के नए रूपों का विकास हुआ है।
  • यही कारण था कि दिसंबर, 2012 में स्त्री अशिष्ट रूपण (निषेध) संशोधन विधेयक, 2012 को राज्यसभा में पेश किया गया।
    तदुपरांत राज्य सभा द्वारा इस विधेयक पर विचार करने के लिए इसे संसद की स्थायी समिति को संदर्भित किया गया था।

प्रस्तावित संशोधन

मानव संसाधन विकास पर स्थायी संसदीय समिति द्वारा की गयी टिप्पणियों और राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अनुशंसाओं के आधार पर निम्नलिखित संशोधन प्रस्तावित किये गए हैं:  निम्नलिखित पदों की परिभाषा का विस्तार :

  • डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक रूप अथवा होर्डिंग या SMS, MMS आदि के माध्यम से विज्ञापन को भी सम्मिलित करने के
    लिए विज्ञापन शब्द की परिभाषा का विस्तार।
  • महिलाओं के अशिष्ट रूपण के आशय का विस्तार- “स्त्री अशिष्ट रूपण” शब्द से तात्पर्य किसी स्त्री की आकृति, उसके रूप या शरीर या उसके किसी अंग का, किसी ऐसी रीति से ऐसे रूप में चित्रण करना है जिसका प्रभाव अशिष्ट हो, अथवा जो स्त्रियों के लिए अपमानजनक या निंदनीय हो, या जिससे लोक नैतिकता अथवा नैतिक आचार के विकृत, भ्रष्ट या उसकी क्षति होने की संभावना हो।
  •  इलेक्ट्रॉनिक रूप का अर्थ मीडिया, चुम्बकीय और ऑप्टिकल रूप में उत्पन्न या संगृहीत जानकारी से है (जैसा कि सूचना
    प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में परिभाषित किया गया है)।
  • प्रकाशन में दृश्य-श्रव्य मीडिया के माध्यम से मुद्रण या वितरण अथवा प्रसारण सम्मिलित है।
  • वितरण के अंतर्गत कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण का उपयोग कर प्रकाशन, लाइसेंस या अपलोडिंग सम्मिलित है।

यह सम्मिलित करने के लिए अधिनियम की धारा 4 का विस्तार किया गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी सामग्री को किसी
भी ऐसे साधन से प्रकाशित या वितरित नहीं कराएगा जिसमे किसी भी रूप में महिलाओं का अशिष्ट निरूपण किया गया हो।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के समान दंड का प्रावधान: IT अधिनियम की धारा 67 और 67 A क्रमशः अश्लील सामग्री प्रसारित करने के लिए तीन से पांच वर्ष तक और स्पष्ट यौनाचार प्रदर्शित करने वाली सामग्री प्रसारित करने के लिए पांच से सात वर्ष तक का दंड निर्धारित करती हैं।

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के अधीन एक केन्द्रीय प्राधिकरण का निर्माण, जिसकी अध्यक्षता NCW के सदस्य सचिव द्वारा की जाएगी। इसमें भारतीय विज्ञापन मानक परिषद, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया व सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के
प्रतिनिधि सम्मिलित होंगे और महिलाओं के मुद्दे पर कार्य का अनुभव रखने वाला एक अन्य सदस्य सम्मिलित होगा।

इसका कार्य प्रसारित किये गए किसी भी कार्यक्रम या विज्ञापन अथवा प्रकाशन के संबंध में शिकायतें प्राप्त करना होगा और
स्त्रियों के अश्लील निरूपण से सम्बंधित सभी मामलों की जांच करना होगा।

महत्व

  • यह संशोधन इंटरनेट, उपग्रह आधारित संचार, केबल टेलीविजन इत्यादि जैसे संचार के नए रूपों को सम्मिलित करने के लिए
    इस अधिनियम के दायरे का विस्तार करता है। संचार के ये रूप 1986 के अधिनियम के दायरे से बाहर थे, चूंकि यह अधिनियम मुख्य रूप से प्रिंट मीडिया और विज्ञापन पर केन्द्रित था।
  • कानूनों की प्रयोज्यता में जटिलताएँ कम करता है क्योंकि यह संशोधन अधिनियम को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अनुरूप संरेखित करना चाहता है।
  • प्रतिशोध पॉर्न (रिवेंज पॉर्न) के बढ़ते खतरे का मुकाबला करता है। प्रस्तावित संशोधन लिंग-विशिष्ट कानून है और इस प्रकार, इसके वेब पर ऐसी किसी भी गैर-सहमति प्राप्त सामग्री की उपस्थिति का सामना करने के लिए एक सक्षमकारी प्रावधान होने
    की संभावना है।

चिंताएं

  • “अशिष्ट निरूपण” शब्द को अभी भी स्पष्ट तरीके से परिभाषित नहीं किया गया है जिसके कारण इसकी अनुचित व्याख्या की जा सकती है।
  • जब अपमानजनक चित्रण का मानक स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया जाता है तो सदैव रूढ़िवादी नैतिकता के मापदंड के आधार पर इसका अर्थ निकाले जाने की संभावना होती है। उदाहरण के लिए हाल ही में फिल्म प्रमाणन में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) विवाद का प्रकरण।
  • यह इस हद तक स्त्री के शरीर की मोरल पोलिसिंग को प्रोत्साहित करने में सक्षम है कि नग्नता से जुडी किसी भी सामग्री को अस्वीकार कर दिया जाएगा या प्रतिबंधित कर दिया जाएगा चाहे उसके प्रकाशन के पीछे जो भी उद्देश्य हों, जैसे स्तन कैंसर जागरूकता वीडियो जिसे फेसबुक द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था।

हालांकि बाद में फेसबुक ने इसके लिए क्षमा भी मांगी थी। हाल ही में, मुखपृष्ठ पर बच्चे को स्तनपान कराती मॉडल को दिखाने वाली केरल की पत्रिका स्तनपान कराने का सन्देश सार्वजनिक रूप से संप्रेषित कर रही थी। जबकि पत्रिका के विरुद्ध इस अधिनियम की धारा 4 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया था।

  • अजय गोस्वामी बनाम भारत संघ (2007) वाद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता [अनुच्छेद 19 (1) (A)] के साथ टकराव: IPC की धारा 292 और स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986 की धारा 3, 4 और 6 के दायरे का परीक्षण करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता का दमन तब तक नहीं किया जा सकता है जब तक इस स्वतंत्रता के प्रयोग के कारण सृजित स्थितियां संकटपूर्ण एवं समुदाय के हित को खतरे में डालने वाली न हो जाएं।

संबंधित प्रकरण

  • अवीक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2014) प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने उन दो पत्रिकाओं के विरुद्ध इसी
    अधिनियम के अंतर्गत दर्ज मुक़दमे को रद्द कर दिया था जिनमें टेनिस खिलाड़ी बोरिस बेकर की गहरी काली त्वचा वाली उनकी मंगेतर बारबरा फेल्टस के साथ रंगभेद की प्रथा के कठोर विरोध के रूप में खिंचाए गए नग्न चित्र को दर्शाते हुए एक लेख प्रकाशित किया गया था। इस मुक़दमे की सुनवाई के अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पत्रिकाओं में छपे चित्र को उस पृष्ठभूमि और उस सन्देश से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए जो यह वृहत स्तर पर विश्व और लोगों को संप्रेषित करता है।
  • इसी प्रकार, बॉबी आर्ट इंटरनेशनल और अन्य बनाम ओम पाल सिंह हूण (1996) प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने फिल्म बैंडिट क्वीन के संदर्भ में अश्लीलता के प्रश्न पर सुनवाई करते हुए कहा था कि फिल्म के तथाकथित आपत्तिजनक दृश्यों को फिल्म द्वारा दिए जा रहे संदेश के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। यह फिल्म उत्पीड़न और हिंसा के उस सामाजिक खतरे के बारे में सन्देश देती है जिससे एक पीड़ित असहाय लड़की एक खतरनाक डाकू बन जाती है।

आगे की राह

  • जब तक कि वास्तव में यह निर्धारित करने के लिए मानक तय नहीं किए जाते हैं कि क़ानून किस कृत्य के लिए दण्डित करने
    का प्रयास कर रहा है तब तक प्रवर्तन हेतु प्रस्तावित नियामकीय ढांचा अर्थहीन रहेगा।
  • सरकार को कार्यशालाओं, मेलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संगोष्ठियों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों आदि के माध्यम से स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986 सहित महिलाओं से संबंधित विभिन्न कानूनों पर नियमित रूप से जागरूकता सृजन कार्यक्रम
    और प्रचार अभियान आयोजित करने चाहिए।

इसके अतिरिक्त, महिलाओं के अधिकारों से संबंधित कानूनों पर जागरूकता उत्पन्न करने के लिए नियमित रूप से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विज्ञापन प्रसारित किये जाने चाहिए।

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