महिलाओं के खिलाफ भेदभाव (Discrimination Against Women)

महत्वपूर्ण तथ्य और आंकड़े

  •  लैंगिक असमानता सूचकांक (GII) में भारत को 0.53 GII स्कोर के साथ 131 वां स्थान प्राप्त हुआ है।

ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2017 में भारत 144 देशों की सूची में 108वें स्थान पर है। रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए पुरुषों और महिलाओं के मध्य आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण के अंतराल को समाप्त करने में भारत को लगभग 217 वर्ष लगेंगे। भारत बांग्लादेश (47) और चीन (100) की तुलना में 21 स्थान फिसलकर 108वें स्थान पर आ गया है।

  •  भारत की सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक भागीदारी एवं अवसरों की उपलब्धता (economic participation and
    opportunity pillar) को लेकर है, जिसमें भारत 139वें स्थान पर है। स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता के मामले में यह 141 वें स्थान पर है।
  • भारत की रैंकिंग में गिरावट का मुख्य कारण राजनीतिक भागीदारी और सशक्तिकरण सम्बन्धी मानकों पर अत्यंत मंद प्रदर्शन है।

लैंगिक समानता के पक्ष में तर्क

 आर्थिक रूप से –

  •  विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि लैंगिक समानता में सुधारों के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण आर्थिक लाभांश प्राप्त हो
    सकते हैं जो अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं की परिस्थितियों और उनके सामने आने वाली विशिष्ट चुनौतियों के आधार पर  भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।
  • श्रम बाजार और शिक्षा कार्यक्रमों में सामान्य सार्वजनिक निवेश की तुलना में लक्ष्य आधारित लैंगिक समानता को
    समर्थन देने का GDP पर अधिक सुदृढ़ प्रभाव पड़ता है।
  • इसके अतिरिक्त ग्लोबल ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स में उच्च प्रदर्शन करने वाले देश अपने लैंगिक अंतराल को कम करके अपने
    देश की प्रतिभा के विकास और उसके इष्टतम उपयोग को अधिकतम बनाने में सफल रहे हैं।

सामाजिक रूप से –

  • शिक्षा में निवेश के समान ही स्वास्थ्य में निवेश तथा विशेष रूप से माताओं, नवजात शिशुओं और बाल स्वास्थ्य में | निवेश का एक महत्वपूर्ण गुणक प्रभाव पड़ता है।

राजनीतिक रूप से –

  • महिलाओं से सम्बंधित मुद्दों के व्यापक सामाजिक निहितार्थ हैं जो पारिवारिक जीवन, शिक्षा और स्वास्थ्य के सभी
    पहलुओं से जुड़े हुए हैं।
  • सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी संस्थानों की विश्वसनीयता को बढ़ाती है और साथ ही लोकतान्त्रिक
    परिणामों को उन्नत बनाती है।

भारत में प्रजनन दर की प्रवृत्ति (Fertility Trend in India)

विभिन्न समुदायों की कुल प्रजनन दर (TFR) में परिवर्तन के संबंध में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की चौथे दौर की रिपोर्ट (NFHS-4) प्रकाशित की गई।

कुल प्रजनन दर (TFR)

कुल प्रजनन दर (TFR) को किसी महिला की प्रजनन अवधि के दौरान (15-49) जन्म लेने वाले बच्चों की औसत संख्या के रूप में परिभाषित किया जाता है।

  • यह जन्म दर की तुलना में प्रजनन के स्तर का अधिक प्रत्यक्ष मापक है, क्योंकि यह एक देश में जनसंख्या परिवर्तन की
    संभावना को दर्शाता है।
  • भारत में कुल प्रजनन दर 2005-06 (NFHS-3) के 7 से घटकर 2015-16 (NFHS-4) में 2.2 हो गई है।
  • प्रजनन दर का प्रतिस्थापन स्तर (Replacement level fertility) प्रजनन का वह स्तर है, जिस पर जनसंख्या पूर्ण रूप से
    स्वयं को एक पीढ़ी से दूसरी में परिवर्तित करती है।

विवरण:

भौगोलिक भिन्नता:

  • भौगोलिक भिन्नता: सभी दक्षिणी राज्यों सहित 23 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में प्रजनन दर, प्रतिस्थापन दर से नीचे है। जबकि यह केन्द्रीय, पूर्वी तथा उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में उच्च है।
  • बिहार 3.41 की दर के साथ शीर्ष स्थान पर है।तथा इसके पश्चात क्रमशः मेघालय (3.04) और । उत्तर प्रदेश एवं नागालैंड (2.74) का स्थान आता है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में TFR 2.4 है, जबकि नगरीय क्षेत्रों में यह 1.8 है।
  • राज्य सरकारों द्वारा अनुभव की जा रही प्रजनन की लोक स्वास्थ्य संबंधी चुनौती की प्रकृति एवं प्रसार व्यापक रूप से भिन्न है। नगरीय एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में स्थानीय निकायों की भूमिका का निर्धारण करना इस मौजूदा  विसंगति से निपटने का सबसे प्रभावशाली  तरीका हो सकता है।

परिवार नियोजन हेतु सरकार की योजनाएं

  • मिशन परिवार विकास – इस योजना को उन सात मुख्य राज्यों में आरम्भ किया गया है जहाँ TFR, 3 या इससे अधिक है। इसका लक्ष्य उच्च प्रजनन दर वाले जिलों में लोगों की गर्भ निरोधकों तथा परिवार नियोजन से संबंधित सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना है।
  • ASHAS कार्यकर्ताओं द्वारा गर्भ निरोधकों की होम डिलीवरी करने हेतु योजना: इस योजना के अंतर्गत ASHAS कार्यकर्ता,
    समुदाय में गर्भ निरोधकों का घर-घर वितरण कर रही हैं।
  • राष्ट्रीय परिवार नियोजन बीमा योजना (NFPIS) के तहत बंध्याकरण (स्टरलाइज़ेशन) के पश्चात होने वाली मृत्यु, संभावित
    हानि तथा विफलता की सम्भावनाओं के कारण ग्राहकों का बीमा किया जाता है। इसके अतिरिक्त प्रदाताओं/मान्यताप्राप्त संस्थाओं को उन संभाव्य घटनाओं में अभियोग के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान की जाती है।

शिक्षा का प्रभाव

  • 12 वर्ष या उससे अधिक उम्र की विद्यालयी शिक्षा प्राप्त महिलाओं में प्रजनन दर 1.7 पाई गई है, जबकि जिन महिलाओं ने विद्यालयी शिक्षा प्राप्त नहीं की हैं, उनमें यह दर 3.1 है।
  • शिक्षा का अभाव महिलाओं को प्रजनन नियंत्रण से रोकता है। इस कारण भारत में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य समस्या में वृद्धि होती है
  • शिक्षा का अभाव, कम आयु में गर्भधारण और उच्च प्रसूति दर के साथ संयुक्त रूप से महिलाओं के आर्थिक विकल्पों को सीमित करता है। इस प्रकार यह प्रजनन नियंत्रण को बाधित कर एक दुष्चक्र निर्मित करता है। ज्ञातव्य है कि 44% बेरोजगार महिलाएं जबकि 60% कार्यरत महिलाएं आधुनिक गर्भ निरोधकों का उपयोग कर रही हैं।

गर्भ निरोधकों के उपयोग का विषम प्रारूप:

गर्भ निरोधक पद्धतियों से संबंधित ज्ञान में वृद्धि होने के बावजूद पुरुषों द्वारा प्रजनन प्रबंधन पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। गर्भ निरोधक की सबसे लोकप्रिय पद्धति महिला बंध्याकरण (स्टरलाइज़ेशन) है, जिसकी दर 36% है। पुरुष बंध्याकरण की दर केवल 0.3% है।

भारतीय पुरुषों द्वारा बंध्याकरण (नसबंदी) के प्रति अनिच्छा के कुछ कारण निम्नलिखित हैं:

  • यौन एवं प्रजनन मामलों के संदर्भ में जागरूकता का अभाव ;
  • उचित गर्भ निरोधक विधियों के बारे में जानकारी का अभाव;
  • मिथक एवं भ्रम (नसबंदी को पौरुष की हानि के रूप में माना जाता है);
  • सामाजिक निषेध एवं वास्तविक लजिस्टिकल सीमाएं; गर्भनिरोध के उपलब्ध साधनों, उनके लाभों, दुष्प्रभाव और प्रबंधन से सम्बंधित सेवाओं, सूचनाओं और परामर्श तक कम पहुंच; ।
  • गांवों के स्तर पर स्वास्थ्य कर्मचारी मुख्य रूप से महिलाएं होती हैं एवं उनके द्वारा पुरुषों के साथ इन सामाजिक
    सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील मामलों पर चर्चा करना कठिन होता है।

धर्म का प्रभाव:

  • धर्म का प्रभाव: सांस्कृतिक एवं भौगोलिक कारक तथा विभिन्न राज्यों के विकास का स्तर, TER को निर्धारित करने वाले
    सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक हैं। उच्च TFR वाले राज्यों में सभी समूह उच्च TFR स्तर को प्रदर्शित करते हैं जबकि निम्न TER वाले राज्यों में स्थिति इसके विपरीत है।

आय/सम्पत्ति का प्रभाव:

  • आय/सम्पत्ति का प्रभाव: निम्न आय वाले वर्ग में बच्चों की संख्या सर्वाधिक थी (TFR3.2) जबकि समृद्ध वर्ग में यह सबसे कम (TER – 1.5) थी।
  • सामाजिक रूप से सबसे अल्प विकसित अनुसूचित जनजातियों में प्रजनन दर सर्वाधिक 2.5 पाई जाती है, इनके पश्चात अनुसूचित जातियों में 2.3 तथा अन्य पिछड़ा वर्ग में 2.2 है। उच्च जातियों में यह दर निम्नतम 1.9 है।

बाल लिंगानुपात (Child Sex Ratio)

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (WCD) द्वारा किए गए दावे के अनुसार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ‘ योजना के अंतर्गत बाल लिंगानुपात में वृद्धि हुई है।

जन्म आधारित लिंगानुपात (SRB)- यह प्रति 1000 बालकों पर बालिकाओं की संख्या को दर्शाता है।

बाल लिंगानुपात: यह 0-6 आयु वर्ग के प्रति 1000 बालकों पर बालिकाओं की संख्या को दर्शाता है।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना के परिणामों में वृद्धि के लिए अन्य पहले

  • सुकन्या समृद्धि योजना: यह कन्याओं के लिए एक लघु बचत योजना है। इसके अंतर्गत 9.1% की उच्च ब्याज दर तथा
    आयकर लाभ प्रदान किया जाता है।
  • सेल्फी विद डॉटर: इस पहल का उद्देश्य यह है कि एक कन्या के माता-पिता स्वयं में गौरव की अनुभूति करें।
  • बालिका मंच: इस पहल का उद्देश्य ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ‘ के अन्तर्गत छात्राओं की भागीदारी को बढ़ावा देना तथा
    लिंग संबंधित मुद्दों की जागरूकता में सुधार करना है।

संबंधित तथ्य

  • मंत्रालय ने दावा किया है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना के अंतर्गत शामिल 161 जिलों में से 104 जिलों में लिंगानुपात में वृद्धि हुई है तथा शेष जिलों में लिंगानुपात में गिरावट दर्ज की गई है।
  • इसी प्रकार 2015-16 की तुलना में 2016-17 की प्रथम तिमाही के दौरान गर्भावस्था के पंजीकरण में 119 जिलों ने प्रगति
    दर्शायी है।
  • इसी अवधि के दौरान रिपोर्ट किये गए कुल प्रसवों (डिलीवरीज़) में संस्थागत प्रसवों की संख्या में विगत वर्ष की तुलना में 146 जिलों में सुधार हुआ है।
  • कई जिलों में 2015-16 और 2016-17 के मध्य जन्म के समय लिंगानुपात (SRB) में वार्षिक गिरावट दर्ज की गयी परंतु 2011 की जनगणना के शिशु लिंगानुपात (CSR) की तुलना में इसमें वृद्धि हुई है।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना

घटते हुए बाल लिंगानुपात (CSR) तथा महिला सशक्तिकरण जैसे संबंधित मुद्दों को संबोधित करने के लिए वर्ष 2015 में इस
योजना का शुभारंभ पानीपत (हरियाणा) में किया गया था।

इस योजना में शामिल हैं:

पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन का प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 का प्रवर्तन।

  • प्रथम चरण के अंतर्गत चयनित जिलों (निम्न CSR वाले) में राष्ट्रव्यापी जागरूकता, समर्थन अभियान तथा बहु-क्षेत्रीय
    कार्रवाई।
  • प्रशिक्षण, संवेदनशीलता, जागरुकता में वृद्धि और जमीनी स्तर पर सामुदायिक संघटन के माध्यम से मानसिकता में
    बदलाव पर बल देना। जमीनी स्तर के भागीदारों जैसे – ANM (ऑक्सीलिअरी नर्स मिडवाइफ) और आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) से सहायता लेना निश्चित किया गया है।
  • इन ज़मीनी स्तर के भागीदारों का सहयोग बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने और उनके स्वास्थ्य के विकास हेतु समुदाय और उसके सदस्यों को प्रोत्साहित करने में सहायक सिद्ध होगा।
  • ‘गुड्डी-गुड्डा‘ बोर्डो के माध्यम से लड़कियों और लड़कों के जन्म से संबंधित भिन्न-भिन्न लैंगिक डेटा प्रदर्शित करना अनिवार्य है। यह डेटा पंचायत, आंगनवाड़ी केंद्र आदि प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

कन्या भ्रूण-हत्या पर उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देश

विगत 21 वर्षों में उपर्युक्त अधिनियम के उल्लंघनकर्ताओं के विरुद्ध केवल 3,000 मामले दर्ज किए गए हैं जबकि वास्तव में चिकित्सा संबंधी अपराधों की संख्या 500 मिलियन के लगभग है। उच्चतम न्यायालय ने कन्या भ्रूणहत्या के अपराध को नियंत्रित करने हेतु निर्देशों की एक श्रृंखला जारी की है। इनमें से प्रमुख दिशा-निर्देश निम्नलिखित हैं:

  • केंद्रीकृत डेटाबेस को बनाए रखना: भारत में सभी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश अपने यहाँ की सभी पंजीकरण इकाइयों से प्राप्त नागरिक पंजीकरण रिकॉर्ड का केंद्रीकृत डेटाबेस बनाए रखेंगे ताकि जन्मे लड़कों तथा लड़कियों की संख्या के संबंध में जानकारी को वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जा सके।
  • फ़ास्ट ट्रैक न्यायालय: इस अधिनियम के तहत शिकायतों के निपटान हेतु फ़ास्ट ट्रैक न्यायालयों की स्थापना की जाएगी और संबंधित उच्च न्यायालय इस संबंध में उचित निर्देश जारी करेंगे।
  • एक समिति का गठन किया जाएगा जिसमें उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीश होंगे जो समय-समय पर मामलों की प्रगति की निगरानी करेंगे। पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन का प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 को प्रभावी रूप से कार्यान्वित किया जाएगा।
  • अधिनियम के प्रावधानों से संबंधित जागरूकता अभियानों के साथ-साथ इस सन्दर्भ सामाजिक जागरूकता सम्बन्धी पहले भी आरम्भ की जाएंगी।
  • विभिन्न राज्यों में कार्यरत ऑल इंडिया रेडियो एवं दूरदर्शन केंद्रों को बालिका शिशुओं को बचाने के संबंध में व्यापक रूप से प्रचार करना होगा इसके साथ ही कन्या भ्रूणहत्या के कारण समाज द्वारा जिन गंभीर खतरों का सामना किया जा रहा है उन्हें रेखांकित करना होगा।
  • प्रोत्साहन योजना- न्यायालय ने उन राज्यों एवं संघ शासित प्रदेशों को प्रोत्साहन योजना तैयार करने के लिए निर्देश दिया है। जिनके पास बालिका शिशुओं के लिए कोई प्रोत्साहन योजना मौजूद नहीं है।

पुत्र की इच्छा(Son Meta Preferences)

पुत्र की अत्यधिक इच्छा का परिणाम अंतिम संतान के लिंगानुपात (sex ratio of the last child: SRLC) द्वारा मापा जाता है।

  • भारत में परिवार की अंतिम संतान का लिंगानुपात (SLRC) 1.82 (अर्थात प्रत्येक 100 लड़कियों की अपेक्षा 182 लड़के) है।
    जो 1.05 के आदर्श लिंगानुपात की तुलना में लड़कों के पक्ष में अत्यधिक झुका हुआ है। यह SLRC उन परिवारों के लिए 1.55 तक गिर जाता है जिनमें केवल दो बच्चे हैं। उपयुक्त आंकड़े देश में पुत्र प्राप्ति की अत्यधिक इच्छा को दर्शाते हैं।
  • इससे “अवांछित” कन्याओं की संख्या में वृद्धि (ऐसी बालिकाएं जिनके माता-पिता पुत्र की इच्छा रखते थे किन्तु उसके स्थान पर पुत्री ने जन्म ले लिया हो) होती है। अवांछित कन्याओं की गणना बच्चों के जन्म पर रोक न लगाने वाले परिवारों में आदर्श लिंग अनुपात और वास्तविक लिंगानुपात के अन्तराल के रूप में की जाती है। भारत में यह अंतराल 21 मिलियन है

पुत्रों को वरीयता दिए जाने के कारणों में

  • विवाह के पश्चात बेटियों का अपने पति के घर जाना,
  • पितृ-वंशीयता (बेटियों के स्थान पर बेटों को दी जाने वाली संपत्ति), ० दहेज (जो लड़कियों के होने पर अतिरिक्त लागत का कारण बनती है),
  • वृद्धावस्था का सहारा बेटों को मानना और
  • भारतीय पारंपरिक संस्कारों में बेटों की अधिक महत्वपूर्ण भूमिका इत्यादि शामिल हैं।

पुत्र प्राप्ति की इच्छा (Son meta preferences)

  • माता-पिता इस इच्छा के वशीभूत होकर बच्चों को तब तक जन्म देते रहते हैं जब तक उन्हें वांछित संख्या में पुत्रों की प्राप्ति न हो जाए।
  • यह चयनात्मक गर्भपात का कारण नहीं बनता है परन्तु यह बालिकाओं के लिए हानिकारक हो सकता है क्योंकि इससे उन्हें मिलने वाले संसाधनों में कमी आ सकती है।
  • केवल इस प्रकार के लिंग चयन से लिंग अनुपात में एकाएक परिवर्तन नहीं आता है। हालांकि, इस प्रकार की प्रजनन क्षमता को रोकने से संबंधित नियम लिंग अनुपात को परिवर्तित तो कर देगा किन्तु अलग-अलग दिशाओं में। उदाहरणार्थ यदि अंतिम संतान पुत्र हो तो ऐसा नियम लिंगानुपात को लड़कों की ओर झुका देगा किन्तु यदि अंतिम संतान पुत्र न हो तो लिंगानुपात को लड़कियों के पक्ष में झुका देगा।
  • पुत्र प्राप्ति की इच्छा अंतिम संतान के लिंगानुपात (sex ratio of last child) के रूप में अभिव्यक्त होता है जो बालकों के पक्ष में अत्यधिक झुकाव प्रदर्शित करता है।

कारागार में महिलाएं (Women in Prisons)

महिला तथा बाल विकास मंत्रालय (MWCD) ने “कारागार में महिलाएं (Women in Prisons)” शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। भारत में महिला कैदियों की दशा (2015 के आंकड़ों पर आधारित):

  • भारतीय कारागारों में लगभग 4.2 लाख कैदी हैं, जिनमें से लगभग 18000 (लगभग 4.3%) महिलाएं हैं। इनमें से लगभग 12,000 (66.8%) विचाराधीन कैदी हैं।
  • महिला कैदियों की संख्या में वृद्धि की प्रवृत्ति देखी गयी है। यह वर्ष 2000 में कैदियों की कुल संख्या का 3.3 प्रतिशत थी जबकि वर्ष 2015 में बढ़ कर 4.3% हो गयी।
  • इन महिलाओं में से लगभग 50 प्रतिशत 30 से 50 वर्ष के आयु वर्ग की हैं। शेष 31 प्रतिशत महिलाएँ 18 से 30 वर्ष के आयुवर्ग की हैं।
  • भारत में कुल कारागारों की संख्या 1,401 है। इसमें से केवल 18 कारागार ही अनन्य रूप से महिलाओं के लिए हैं, जिनमें कुल 3000 महिला कैदी रखी जा सकती हैं। इस प्रकार शेष महिला कैदियों की बड़ी संख्या को सामान्य कारागारों के महिला कक्षों में रखा जाता है।

महिला कैदियों के समक्ष समस्याएँ

  • महिलाओं को प्रायः पुरुष कारागार की तुलना में छोटे कक्षों में रखा जाता है। उनकी आवश्यकताओं को सामान्य कैदियों की तुलना में कम महत्व दिया जाता है।
  • यद्यपि कारागारों में महिलाओं के विरुद्ध यौन उत्पीड़न, हिंसा तथा दुर्व्यवहार के अनेक मामले देखे गए हैं तथापि शिकायत निवारण तंत्र अभी भी कमज़ोर है।
  • महिला कर्मचारियों की संख्या अपर्याप्त है जिससे पुरुष कर्मचारियों पर ही महिला कैदियों की भी ज़िम्मेदारी होती है जो उचित नहीं है।
  • महिलाओं की संख्या कम (4.3%) होने के कारण नीतिगत प्राथमिकता में उनकी स्थिति निम्नतर है। इसके कारण स्वच्छता नैपकिन, गर्भवती माताओं के प्रसव पूर्व तथा उपरान्त होने वाली देखभाल जैसी सुविधाओं की स्थिति ठीक नहीं रहती।
  • उन्हें शरीर के अनुसार आवश्यक तथा पोषक भोजन प्रदान नहीं किया जाता।
  • बच्चों के संरक्षण के अपर्याप्त प्रावधानों के कारण महिलाओं का लम्बी अवधि में अपने बच्चों के साथ संपर्क टूट जाता है (छह वर्ष तक के बच्चों को अपनी मां के साथ कारागार में रहने की अनुमति दी जाती है, तत्पश्चात उन्हें बाल गृहों में भेज दिया जाता है)।
  • कैदी होने के कलंक के कारण कारागार से मुक्त किए जाने के पश्चात या तो वे परित्यक्त होती हैं या उनका उत्पीड़न होता है।

महिला कैदियों के लिए उठाए गए अन्य कदम

आदर्श कारागार नियमावली, 2016

  • इस नियमावली में महिला कैदियों तथा उनके बच्चों के लिए अतिरिक्त प्रावधान शामिल हैं।
  • ये प्रावधान UN बैंकॉक नियमों पर आधारित हैं तथा इनका मसौदा पुलिस शोध एवं विकास ब्यूरो (BPR&D) द्वारा तैयार किया गया है। इस नियमावली में महिला कैदियों के लिए महिला चिकित्सकों, अधीक्षकों, पृथक रसोई, गर्भवती महिला कैदियों हेतु प्रसव पूर्व तथा पश्चात देखभाल तथा आसन्न प्रसव के लिए अस्थायी रूप से उन्हें मुक्त करने से सम्बंधित प्रावधान दिए गए हैं।
  • इसमें बच्चों की देखभाल लिए शिशु-सदन (क्रेच) तथा नर्सरी विद्यालय की व्यवस्था की भी बात कही गयी है।

स्वाधार गृहः

यह कठिन परिस्थितियों का शिकार हुई महिलाओं के लिए पुनर्वास संबंधी योजना है। अन्य लाभार्थियों के अतिरिक्त, इस योजना में ऐसी महिला कैदियों को भी सम्मिलित किया जाता है जो कारागार से मुक्त कर दी गयी हैं तथा उनका कोई परिवार नहीं है या उन्हें कोई सामाजिक तथा आर्थिक सहयोग प्राप्त नहीं है।

रिपोर्ट का विस्तृत विवरण तथा उसकी अनुशंसाएं

शिशुओं की देख-भाल करने वाली माताएं:

  • उन्हें कारावास दिए जाने से पूर्व अपने बच्चों की देखभाल की व्यवस्था करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • उनकी गिरफ़्तारी को तार्किक आधार पर अस्थायी रूप से निलंबित करने की भी अनुमति दी जानी चाहिए।
  • यदि उनका कोई रिश्तेदार/मित्र न हो तो उनकी छः वर्ष से कम आयु की संतानों को बच्चों की देखभाल वाली संस्था में रखा जाना चाहिए।
  • बच्चे के साथ उनको लंबे समय तक भेंट करने तथा अपेक्षाकृत कम समयांतराल पर मुलाकात करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

विचाराधीन महिला कैदी:

  •  CrPC की धारा 436A में संशोधन कर उन महिला कैदियों को जमानत प्रदान की जानी चाहिए जिन्होंने अधिकतम संभव दण्ड का एक-तिहाई समय कैद में व्यतीत कर लिया हो।
  • जमानत प्रदान किए जाने किन्तु प्रतिभूति न दे पाने की स्थिति में महिला कैदियों की कारागार से मुक्ति के लिए एक अधिकतम समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए।

वे महिला कैदी जो प्रसव-उपरान्त चरण में हैं:

  • साफ़-सफ़ाई बनाए रखने तथा शिशु को संक्रमण से बचाने के लिए कम से कम शिशु-जन्म के एक वर्ष बाद तक की अवधि के लिए उन्हें पृथक निवास (अकोमोडेशन) प्रदान किया जाना चाहिए।
  • ऐसी महिलाओं के लिए स्वास्थ्य तथा पोषण से संबंधित विशिष्ट प्रावधान बनाए जाने चाहिए।
  • संकीर्ण स्थान में कैद या अनुशासनिक पृथक्करण (close confinement or disciplinary segregation) संबंधी उपाय द्वारा नियंत्रण जैसे सज़ा के प्रावधान गर्भवती तथा शिशु को दूध पिलाने वाली माताओं पर नहीं प्रयोग किये जाने चाहिए।

गर्भवती महिलाएं:

कारावास की अवधि के दौरान क़ानून द्वारा अनुमति प्राप्त सीमा तक उन्हें गर्भपात की सुविधा के बारे में जानकारी तथा उस सुविधा तक पहुँच प्रदान की जानी चाहिए।

संवेदनात्मक अक्षमता या भाषा संबंधी बाधा का सामना कर रही महिलाएं:

  •  ऐसी कैदियों को गोपनीयता के साथ तथा बिना किसी प्रतिबंध के क़ानूनी विचार-विमर्श की सुविधा दी जानी चाहिए।
  • यह सुनिश्चित करने के लिए कि ऐसी महिलाओं के साथ कोई अन्याय न हो, उन्हें स्वतंत्र दुभाषिए की सुविधा प्रदान करने हेतु पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए।

शिकायतों के समाधान के लिए:

  •  स्वयं कैदी के अतिरिक्त, उसके क़ानूनी सलाहकार या उसके परिवार के सदस्यों को उसकी कारावास अवधि के दौरान
  • शिकायत दर्ज कराने का अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए।
  • शिकायतों को दर्ज करने के लिए किसी सुगम्य स्थान पर एक कैदी रजिस्टर भी रखा जा सकता है।
  • निरीक्षण दौरों के दौरान सभी आधिकारिक आगंतुकों को कारागार के अधिकारियों से अलग होकर कैदियों के साथ एक-एक कर बातचीत करनी चाहिए।

मानसिक आवश्यकताओं हेतुः

कम से कम साप्ताहिक अंतराल पर या आवश्यकतानुसार उन्हें महिला परामर्शदाताओं/मनोवैज्ञानिकों की सुविधा दी जानी चाहिए।

महिलाओं के समाज में पुनः एकीकरण हेतु:

  • रोज़गार, वित्तीय सहायता, बच्चों का संरक्षण पुनः प्राप्त करने, आवास, परामर्श, स्वास्थ्य सुविधाओं की निरंतरता को बनाए
    रखने आदि को समाहित करने वाला एक व्यापक अनुवर्ती देखभाल (after care) कार्यक्रम लागू किया जाना चाहिए।
  • कारागार से मुक्ति के पश्चात महिला को पूरी तरह से अपनाने के लिए परिवार के सदस्यों तथा संबंधित नियोक्ताओं को भी
    परामर्श की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए।
  • यह सुनिश्चित करने के लिए कि स्थानीय पुलिस कारागार से मुक्त कैदियों का उत्पीड़न न करे (उन पर लगाए गए लांछन के
    कारण), कारागार अधिकारियों को उनके साथ समन्वय करना चाहिए।
  •  प्रत्येक जिले में कारागार से मुक्त की गयी महिला कैदियों की सहायता के लिए कम से कम एक स्वयंसेवी संगठन नामित तथा
    प्राधिकृत किया जाना चाहिए।
  • कैदियों को मतदान का अधिकार भी प्रदान किया जाना चाहिए।

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