भारत में वृद्धजन (Elderly In India)

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में वरिष्ठ नागरिकों (60 वर्ष से ऊपर) की जनसंख्या 10.8 मिलियन है। आगामी वर्षों में इनकी संख्या में काफी वृद्धि की सम्भावना है क्योंकि जीवन प्रत्याशा जोकि वर्ष 1960 में 42 वर्ष थी अब बढ़कर 65 वर्ष हो गई है। वस्तुतः यह पूर्वानुमान लगाया गया है कि वर्ष 2000 और 2050 के मध्य भारत की जनसंख्या में 55% तक की वृद्धि होगी। हालाँकि 60 वर्ष और 80 वर्ष से ऊपर की आयु की जनसंख्या में क्रमशः 326% तथा 700% की वृद्धि होगी। भारत में उन लोगों को वृद्धजनों (बुजुर्ग) की श्रेणी में रखा गया है जिनकी आयु 60 वर्ष से ऊपर है तथा इनका प्रतिशत वर्ष 2015 के 8% से बढ़ कर 2050 में 19% होने की अपेक्षा की गई है।

जब जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होती है तो ऐसी स्थिति में सरकारें प्राय: परिणामों से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होती हैं। अतः इसका वृद्धजनों की सामाजिक-आर्थिक तथा स्वास्थ्य संबंधी स्थिति पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए जनांकिकीय प्रतिमानों में अनुमानित बदलाव को देखते हुए वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण को सुनिश्चित करना भविष्य में और भी अधिक महत्वपूर्ण होगा।

भारत में वृद्धावस्था की चुनौतियाँ

  • प्रवास और वृद्धजनों पर इसके प्रभाव: युवा लोगों के प्रवास के कारण वृद्धजन अकेले या केवल अपने जीवनसाथी के साथ रह
    जाते हैं। इनके कारण उन्हें सामाजिक अलगाव, निर्धनता तथा तनाव का सामना करना पड़ता है।
  • स्वास्थ्य देखभाल में कमी: स्वास्थ्य प्रणाली में बढ़ते गैर-संचारी रोगों (Non-Communicable Disease: NCDs) से निपटने हेतु पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। इसके साथ ही चिकित्सीय स्टाफ डिमेंशिया (dementia) या निर्बलता (frailty) से पीड़ित बुजर्गों का उपचार करने या परामर्श देने में तथा प्रारंभिक निदान एवं उच्च रक्तचाप जैसी अवस्थाओं के प्रबंधन में भली-भांति प्रशिक्षित नहीं है। चिकित्सा देखभाल की गुणवत्ता बहुत ही निम्न स्तरीय है तथा अस्पताल में भर्ती होने की लागत अत्यधिक होती है और यह निर्धन भी बना देती है।
  • सामाजिक सामंजस्य न होने का प्रभाव: NCDs से पीड़ित गाँव में रहने वाले तथा अंतर्जातीय या अन्य संघर्षों का सामना करने वाले वृद्धजनों का अनुपात 2005 से 2012 के दौरान दोगुने से भी अधिक हो गया है। सामाजिक सामंजस्य का अभाव निस्सहायता तथा चिकित्सा आपूर्तियों एवं नेटवर्क समर्थन के विघटन को प्रेरित करता है।
  • डिजिटल निरक्षरताः संचार की आधुनिक डिजिटल भाषा और अधिक चुनौतीपूर्ण जीवनशैली को समझने में परिवार के वृद्ध सदस्यों की असमर्थता के कारण परिवार के वृद्ध एवं युवा सदस्यों के मध्य संचार का अभाव पाया जाता है। वे डिजिटलीकृत योजनाओं के तहत लाभ प्राप्त करने में भी कठिनाई का अनुभव करते हैं।
  • वृद्ध महिलाओं की बढ़ती जनसंख्या (वृद्धावस्था का स्त्रीकरण): वर्तमान में सभी राज्यों में वृद्ध पुरुषों की तुलना में वृद्ध महिलाओं की जीवन प्रत्याशा उच्चतर है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार वृद्धजनों में लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 1033 महिलाओं का था। वृद्ध महिलाओं की बढ़ती जनसंख्या का परिणाम महिलाओं द्वारा बढ़ती उम्र के साथ अनुभव किया जाने वाला भेदभाव तथा उपेक्षा है। प्रायः वैधव्य तथा अन्य सदस्यों पर पूर्ण निर्भरता इसमें वृद्धि कर देते हैं।
  • वृद्धजनों का ग्रामीणीकरण: 2011 की जनगणना के अनुसार 71% वृद्धजन ग्रामीण भारत में निवास करते हैं। आय असुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल तक पर्याप्त पहुंच का अभाव तथा अलगाव ग्रामीण वृद्धों हेतु उनके शहरी समकक्षों से अधिक विकट है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि ओडिशा, बिहार तथा उत्तर प्रदेश जैसे निर्धनतम राज्यों में ग्रामीण वृद्धजनों का
    प्रतिशत सर्वाधिक है।

वृद्धावस्था के प्रति नीतिगत अनुक्रिया

  • राष्ट्रीय वृद्धजन नीति (National Policy on Older Persons: NPOP), 1999: यह वित्तीय एवं खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, वृद्धजनों की आश्रय संबंधी और अन्य आवश्यकताओं, विकास में समान भागीदारी, दुर्व्यवहार व शोषण के विरुद्ध संरक्षण तथा उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने हेतु, सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए राज्य सहायता की
    परिकल्पना करती है। प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, वरिष्ठ नागरिकों हेतु स्वास्थ्य बीमा योजना, वरिष्ठ पेंशन बीमा योजना 2017, निर्धनता रेखा से नीचे के वरिष्ठ नागरिकों हेतु सहायता एवं जीवन यापन के लिए सहायक उपकरण उपलब्ध करवाने हेतु योजना, वरिष्ठ नागरिक कल्याण कोष इत्यादि इसके अंतर्गत प्रारम्भ की गई विभिन्न योजनाएं
  • भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007: यह अधिनियम वृद्ध अभिभावकों तथा दादा-दादी/नाना-नानी के भरण-पोषण हेतु एक विधिक फ्रेमवर्क उपलब्ध करवाता है। हाल ही में वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 में संशोधन प्रस्तावित किए गए थे। इन संशोधनों में शामिल हैं- भरण-पोषण भत्ते की अधिकतम सीमा को समाप्त करना, प्रतिवादियों के अपील करने के अधिकार में विस्तार, अभिभावकों को सम्पत्ति के हस्तांतरण के निरसन के लाभों का विस्तार, न्यायाधिकरण के द्वारा आवेदनों की प्राप्ति की तिथि से उनके निपटान हेतु समय-सीमा का आकलन इत्यादि।
  • वृद्धजन हेतु एकीकृत कार्यक्रम: यह विविध सुविधाओं जैसे कि वृद्धाश्रमों (old-age homes), डे केयर सेंटर्स, फिजियोथेरपी चिकित्सालयों, अक्षमता सहायता की व्यवस्था आदि के क्रियान्वयन हेतु पंचायती राज संस्थाओं/स्थानीय निकायों, गैरसरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, धर्मार्थ अस्पतालों/ नर्सिंग होम्स इत्यादि को वित्तीय सहायता (90% तक) उपलब्ध करवाता है।
  • वृद्धजनों हेतु स्वास्थ्य देखभाल: वृद्धजनों हेतु स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत क्रियान्वित किया जा रहा है। मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (NPHCE) 2010-11 के दौरान प्रारम्भ किया गया था।
  • सामाजिक पेंशन: निर्धनों तथा निराश्रित लोगों को सामाजिक सहायता प्रदान करने हेतु राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम का आरंभ किया गया था।
  • वरिष्ठ नागरिकों पर राष्ट्रीय नीति, 2011 भी वृद्ध लोगों से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित करती है, जैसे कि आय सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, सुरक्षा, संरक्षण, आवास, उत्पादक वृद्धावस्था (productive aging), लोक कल्याण, बहुपीढ़ीगत संबंध आदि। इसने वृद्धजनों हेतु आवश्यक नीतिगत परिवर्तनों का सुझाव देने हेतु एक राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक परिषद की भी स्थापना की है।
  • भारत साउथ एशिया पार्टनरशिप ऑन एजिंग: द काठमांडू डिक्लेरेशन 2016 का हस्ताक्षरकर्ता भी है। यह डिक्लेरेशन दक्षिण
    एशिया क्षेत्र में वृद्ध जनसंख्या की विशेष आवश्यकताओं पर ध्यान केन्द्रित करता है।

आगे की राह

  • विभिन्न प्रथाओं यथा फील्ड से फीडबैक प्राप्त करने, नीति और कार्यक्रम लेखा परीक्षा (ऑडिट) को प्रोत्साहन तथा राज्य
    सरकारों द्वारा बेहतर नीतियों एवं कार्यक्रमों को अपनाकर नीतियों और कार्यक्रमों की प्रासंगिकता में वृद्धि किये जाने की आवश्यकता है।
  • एक समर्थकारी परिवेश के सृजन के माध्यम से बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं, जैसे कि पीढ़ियों के मध्य बेहतर संबंधों का भरण-पोषण, उनकी रक्षा और सुरक्षा को सुनिश्चित करना तथा लक्षित लाभों का बेहतर दोहन करना।
  • वरिष्ठ नागरिकों से सम्बद्ध योजनाओं को एक पुनर्गठित दिव्यांगजन और वरिष्ठ नागरिक विभाग के अंतर्गत लाया जा सकता है। विभाग द्वारा विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी हितधारकों के इनपुट के साथ एक एकीकृत कार्यान्वयन और निगरानी योजना विकसित की जानी चाहिए।
  • वृद्ध जनसंख्या के एक महत्वपूर्ण भाग हेतु डे केयर (आवासीय केन्द्रों के स्थान पर) अधिक स्वीकार्य है। इसलिए वृद्धजनों हेतु एकीकृत कार्यक्रम (Integrated Programme for Older Persons: IPOP) के तहत डे केयर/संवर्धन केन्द्रों की स्थापना को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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