जलवायु परिवर्तन: वैश्विक स्तर पर किए गए प्रयास

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 पेरिस जलवायु समझौता (Paris Climate Deal)

पेरिस समझौते में जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध ( 2020 के पश्चात ) कार्यवाही करने हेतु विश्व के सभी देशों के लिए एक कार्य योजना प्रस्तुत की गयी है। इसका उद्देश्य विभिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों के आलोक में समता, साझा किन्तु विभेदीकृत उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांतों को प्रतिबिंबित करते हुए जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध तथा वैश्विक तापन को सीमित करने के लिए वैश्विक प्रयासों को प्रोत्साहित करना है।

पेरिस समझौते की मुख्य विशेषताएं

  • उद्देश्य: वैश्विक औसत तापमान में पूर्व-औद्योगीकरण स्तर के मुकाबले 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि नही होने देना और यहाँ
    तक कि वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखने का प्रयास करना।
  • केवल शमन-केंद्रित नहीं बल्कि व्यापक दृष्टिकोण: यह एक व्यापक और संतुलित समझौते के लिए सभी आवश्यक महत्वपूर्ण क्षेत्रों को समाविष्ट करता है, जिसमें शमन, अनुकूलन, लॉस एंड डैमेज, वित्त, तकनीकी विकास एवं हस्तांतरण, क्षमता निर्माण और कार्यवाही एवं सहायता में पारदर्शिता इत्यादि सम्मिलित हैं।
  • विकासशील देशों द्वारा सर्वाधिक कमजोर वर्ग के हितों की रक्षा करने के साथ-साथ विकास के अधिकार एवं पर्यावरण संरक्षण के | साथ विकास का समन्वय स्थापित करने के प्रयासों को मान्यता देने के माध्यम से उनकी विकास अनिवार्यताओं को स्वीकार करना।
  • जलवायु कार्य योजनाएं: देशों के लिए यह आवश्यक है कि वे प्रत्येक पांच वर्ष में UNFCCC को इस बारे में सूचित करें कि उन्होंने ‘राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान (NDC)’ नामक जलवायु कार्य योजनाओं के संदर्भ में क्या प्रगति की है।
  • विकसित देशों द्वारा वित्त पोषण : विकसित देशों से अपने वित्तीय सहायता के स्तर को बढ़ाने के साथ ही इस सम्बन्ध में एक रोडमैप प्रस्तुत करने का भी आग्रह किया गया है कि वे किस प्रकार 2020 तक संयुक्त रूप से 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर और 2025 तक प्रति वर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रदान करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ेंगे। इस सन्दर्भ में अन्य पक्ष भी पूर्णतया स्वैच्छिक आधार पर अपना योगदान कर सकते हैं।
  • जलवायु तटस्थता: 21 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में कार्बन उत्सर्जन तथा कार्बन सिंक के मध्य संतुलन स्थापित हो जाना चाहिए।
  • प्रदर्शन मूल्यांकन: पेरिस समझौते के उद्देश्य और उसके दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में सामूहिक प्रगति का आकलन करने के लिए सभी घटकों को समाविष्ट करने वाला एक वैश्विक स्टॉकटेक (stocktale) प्रत्येक पांच वर्ष (वर्ष 2023 से आरंभ होकर) में संपन्न होगा।
  • निगरानी: पेरिस समझौता गैर-दंडात्मक और सहयोगात्मक प्रकृति वाले एक अनुपालन तंत्र की स्थापना का प्रावधान करता है। यह तंत्र विशेषज्ञों की एक समिति की निगरानी में कार्य करेगा।

समझौते के सकारात्मक परिणाम

  • समझौते की सार्वभौमिक प्रकृति: पूर्ववर्ती समझौतों में उत्सर्जन को कम करने का समग्र उत्तरदायित्व समृद्ध देशों पर रखा गया था।
    पेरिस समझौते में सभी 196 हस्ताक्षरकर्ता इस बात पर सहमत हुए कि प्रत्येक देश को कार्रवाई करनी चाहिए। इस बात को स्वीकार किया गया है कि समृद्ध देशों का यह दायित्व है कि वे तत्काल कार्यवाही आरंभ करें और उत्सर्जन में अधिक तीव्रता से कटौती करें जबकि निर्धन देशों द्वारा दिए गए योगदान उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर होंगे।
  • रैचेट मैकेनिज्म (Ratchet mechanism) यह समझौते के लिए प्रयुक्त एक तकनीकी शब्द है जिसके अंतर्गत संलग्न देशों को वर्ष 2020 तक नये संकल्प प्रस्तुत करने होंगे। अधिकतर INDCs का लक्ष्य वर्ष 2030 निर्धारित किया गया है, किन्तु यदि लक्ष्य के अनुरूप कार्य नहीं किया जाता है तो तो इस शताब्दी के अंत तक तापमान में वृद्धि का 1.5°C से कम रहना और यहाँ तक कि 20C से कम रहना भी लगभग असंभव होगा। इस सन्दर्भ में रैचेट मैकेनिज्म वर्ष 2020 में संलग्न देशों की पुनः बैठक को अनिवार्य बनाता है जिसमें सभी देश 2025 से 2030 के लिए अपनी योजनाओं को स्पष्ट करेंगे। यह विश्व के तापमान में वृद्धि को 20C से कम रखने के लिए संभावित रूप से एक अवसर का सृजन करता है।
  • वित्त पोषण हेतु विभेदीकृत उत्तरदायित्वः समृद्ध विकासशील देशों ने जलवायु वित्तपोषण में योगदान करना आरंभ कर दिया है। पेरिस समझौते के अंतर्गत समृद्ध विकासशील देशों, विशेष रूप से चीन ने योगदान करने का औपचारिक उत्तरदायित्व स्वीकार करने से इंकार कर दिया किन्तु वे इसे स्वैच्छिक आधार पर करने के लिए सहमत हुए हैं।
  • विकासशील राष्ट्रः विकासशील देशों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि भले ही कम प्रभावशाली रूप में किन्तु उन्होंने ‘विभेदीकरण‘ अर्थात् CBDR (Common But Differentiated Responsibilities) के सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतों को अपनाया है।
  • सिविल सोसाइटी की भूमिका: नगरों, क्षेत्रों, व्यापार एवं सिविल सोसाइटी द्वारा जलवायु कार्यवाही (क्लाइमेट एक्शन) के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों की पृष्ठभूमि में पेरिस समझौता हुआ। पेरिस समझौते के दौरान विभिन्न देशों ने इन पहलों के अत्यधिक महत्व को स्वीकार किया। उन्होंने पेरिस समझौते के त्वरित क्रियान्वयन के अनिवार्य भाग के रूप में इन कार्यवाईयो की निरंतरता बनाए रखने और इनके स्तर में वृद्धि करने का आह्वान किया।
  • ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को अपनाना : पेरिस सम्मेलन से पूर्व देशों ने जो लक्ष्य प्रस्तुत किए हैं, उनसे यह स्पष्ट है कि अब पवन, सौर और जलविद्युत की मांग में वृद्धि होगी।

भारत का INDC

  • सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को वर्ष 2005 के स्तरों की तुलना में वर्ष 2030 तक 33-35 प्रतिशत तक कम करना।
  • प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और हरित जलवायु निधि (GCF) सहित कम लागत के अंतर्राष्ट्रीय वित की सहायता से वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन पर आधारित ऊर्जा संसाधनों से संस्थापित विद्युत क्षमता का लगभग 40 प्रतिशत प्राप्त करना।
  • वर्ष 2030 तक अतिरिक्त वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 2.5-3 बिलियन टन CO2 के समतुल्य अतिरिक्त कार्बन सिंक सृजित करना।

चिंताएं:

विकसित और विकासशील देशों के मध्य टकराव

  • ‘पारदर्शिता’ के मुद्दे परः विकसित देश चाहते है कि INDC के अंतर्गत की गयी जलवायु कार्यवाहियों की तुलना करने के लिए ‘साझा और एकीकृत’ प्रणाली होनी चाहिए। जबकि विकासशील देश चाहते है कि पारदर्शिता सम्बन्धी प्रावधानों में CBDR-RC सिद्धांत प्रतिबिंबित हो। 5 वर्षों में INDCs के कार्यान्वयन में प्रगति का आकलन करने के लिए ‘स्टॉकटेक’ (Stocktake) प्रावधान किया गया है।हालांकि, विकसित देश शमन पहलू को विशिष्ट बनाए रखना चाहते हैं और सभी को इसके लिए उत्तरदायी बनाना चाहते हैं,
    किन्तु वे वित्तपोषण और तकनीकी हस्तांतरण से संबंधित प्रावधान नहीं चाहते हैं।
  • ‘ऐतिहासिक जिम्मेदारी’ के सिद्धांत को नजरअंदाज कर दिया गया है। तुलना का आधार केवल वर्तमान उत्सर्जन शमन रणनीतियों को बनाया गया है। इसका अर्थ है कि यदि चीन भारत से अधिक कोयले का उपयोग करता है, तब भी उसे नजरअंदाज कर दिया जाएगा, क्योंकि पूर्व में इसके अत्यधिक उत्सर्जन के बावजूद इसमें क्रमिक गिरावट आई है। यह आधार समतामूलक नहीं है।
  • INDC की स्वैच्छिक प्रकृति: प्रतिबद्धताएं स्वैच्छिक हैं, और उन्हें पूरा करने में विफल रहने पर किसी प्रकार के दंड का प्रावधान नहीं है। यहां तक कि यदि वे पूरी भी हो जाती हैं, तो भी वे विश्व के औसत तापमान में 2°C से कम वृद्धि सुनिश्चित नही कर पाएंगी। सर्वाधिक आशावादी अनुमान के अनुसार यदि वैश्विक स्तर पर केवल INDC जैसी स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं का भी अनुपालन किया गया तो वैश्विक तापमान में 2.7 से 3.5°C तक की वृद्धि अवश्यम्भावी है।
  • जीवाश्म ईंधन पर कार्रवाई का अभाव : संयुक्त राष्ट्र का दृष्टिकोण देशों को उत्सर्जन में कटौती करने और नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग करने, ऊर्जा दक्षता, अथवा कार्बन सिंक में वृद्धि को प्राप्त करने के लिए तैयार करना है। किन्तु संयुक्त राष्ट्र ने जीवाश्म ईंधन के विकास को प्रतिबंधित करने की बात नहीं की।
  • पारंपरिक अधिकारों के प्रति अज्ञानताः जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण जैसी गतिविधियों के कारण पीड़ित लोगों के स्थानीय अधिकारों का उल्लेख समझौते की प्रस्तावना में किया गया है किन्तु इसे परिचालन पाठ (ऑपरेशनल टेक्स्ट) में नहीं रखा गया है।
  • सबसे बड़े उत्सर्जक द्वारा अनुपालन किया जानाः समृद्ध देशों का INDC अपने ऐतिहासिक दायित्वों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने पेरिस समझौते से अपना नाम वापस ले लिया। यह समझौते के आधार के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है।
  • वित्तीय प्रतिबद्धताओं का प्राप्त न होना : विकसित देशों द्वारा ग्रीन क्लाइमेट फण्ड के लिए वार्षिक 100 बिलियन डालर का योगदान करने की प्रतिबद्धता को अभी तक पूरा नही किया गया है। हालांकि, विकसित देशों के योगदान में वृद्धि हुई है तथापि यह वास्तविक आवश्यकताओं से काफी कम है।

बॉन क्लाइमेट चेंज कांफ्रेंस (COP-23) (Bonn Climate Change Conference)

  • यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टीज (COP-23) की 23वीं
    बैठक बॉन, जर्मनी में संपन्न हुई।
  • अमेरिका द्वारा पेरिस समझौते से अपना नाम वापस लेने के बाद यह वार्ता का प्रथम प्रयास है।
  • पोस्ट 2020 एक्शन, 2015 के पेरिस समझौते के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित प्रतिबद्धताओं (नेशनली डिटरमिड कॉन्ट्रीब्यूशंस: NDCs) के अनुसार सभी देशों के लिए मान्य हैं।
  • प्री 2020 एक्शन, क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत शमन कार्रवाई करने हेतु समृद्ध और विकसित देशों के छोटे समूह के मौजूदा दायित्वों को दर्शाते हैं।
  • लीमा वर्क प्रोग्राम ऑन जेंडर (COP -2014): इसका लक्ष्य सभी वार्ताओं के दौरान लैंगिक रूप से अनुक्रियात्मक जलवायु नीतियों और अधिदेशों के कार्यान्वयन को आगे बढ़ाना है।

महत्वपूर्ण बिंदु:

कार्यान्वयन के लिए फ़िजी मोमेंटम को अपनाना: इस बैठक ने 2018 में समझौता वार्ता का मार्ग प्रशस्त किया। इसे तीन भागों में विभाजित किया गया है जो निम्नलिखित से संबंधित हैं:

  • पेरिस समझौते की कार्य योजना को पूर्ण करना: पार्टियों ने सचिवालय को विभिन्न हितधारकों द्वारा क्रियान्वित किए जा रहे
    पेरिस समझौते की कार्य योजना की समीक्षा हेतु एक ऑनलाइन प्लेटफार्म विकसित करने का अनुरोध किया है।
  • तालानोवा वार्ता: तालानोवा वार्ता एक फैसिलिटेटिव डायलाग है। इसका शुभारम्भ 2018 में संपन्न होने वाले COP-23 में
    किया गया। इस वार्ता का उद्देश्य पेरिस समझौते के दीर्घकालिक लक्ष्यों की प्रगति के संबंध में पार्टियों के सामूहिक प्रयासों की समीक्षा करना तथा नेशनली डिटरमाइंड कॉट्रिब्यूशंस (NDCs) की तैयारियों के सम्बन्ध में सभी को सूचित करना है।
  • प्री-2020 का कार्यान्वयन एवं महत्वाकांक्षा: पार्टियों ने सहमति व्यक्त की है कि 2020 में पेरिस समझौते के संचालित होने से पहले, प्री-2020 प्रतिबद्धताओं पर चर्चा करने हेतु 2018 और 2019 में दो स्टॉक-टेक (stock-take) अर्थात् तैयारियों की क्रमबद्ध जाँच के सम्मेलन आयोजित किये जाएँगे।

कृषि: 6 वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद कृषि पर जलवायु के प्रभाव से निपटने के लिए एक निर्णय लिया गया। पार्टियों द्वारा निम्नलिखित को प्रस्तुत करना आवश्यक है; कृषि क्षेत्र में जलवायु कार्यवाहियों की रिपोर्टिग; मृदा-स्वास्थ्य में सुधार, मृदा कार्बन और मृदा की गुणवत्ता में सुधार के लिए अनुकूलन मूल्यांकन विधियों का उपयोग और साथ ही पोषक तत्वों के उपयोग और खाद प्रबंधन में सुधार के उपाय; तथा सामाजिक-आर्थिक एवं खाद्य सुरक्षा आयामों की रिपोर्टिंग इत्यादि।

जेंडर एक्शन प्लान: UNFCCC के तहत जेंडर एक्शन प्लान सर्वप्रथम COP-23 (इससे पहले जलवायु कार्यवाहियों में लैंगिक भूमिका को लीमा कार्यक्रम में शामिल किया गया था) में अपनाया गया। इसमें निम्नलिखित पाँच प्राथमिकताएँ शामिल हैं:

  1. क्षमता निर्माण
  2. ज्ञान को साझा करना एवं संचार
  3. लैंगिक संतुलन और महिलाओं द्वारा नेतृत्व
  4. कन्वेंशन तथा
  5. पेरिस समझौते का लैंगिक रूप से अनुक्रियात्मक कार्यान्वयन

लोकल कम्युनिटीज़ एंड इंडीजेनस पीपल्स प्लेटफॉर्म (स्थानीय समुदायों और मूल निवासियों का मंच): यह पेरिस समझौते के कार्यान्वयन में मूल निवासियों की माँगो को शामिल करने हेतु एक नया मंच है। यह मंच लोगों को शिक्षित करने, क्षमता में वृद्धि करने तथा अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय जलवायु कार्य योजना में विविध प्रकार की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का समावेश करने की सुविधा प्रदान करेगा। यह अप्रैल-मई 2018 से पूर्णतया कार्य करना प्रारम्भ कर देगा।

हानि एवं क्षतिः वार्ता में हानि और क्षति के मुद्दे पर संबंधित पार्टियों के मध्य वित्तीय प्रतिबद्धताओं पर सहमति नहीं बन पायी है।

COP-23 के दौरान प्रारंभ अन्य पहलें

  • कोयला सम्बन्धी पूर्व संधियों को सशक्त बनाना: इसे ब्रिटेन और कनाडा द्वारा आरम्भ किया गया है। 2030 तक कोयला आधारित विद्युत् के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से कम करने हेतु 15 देश संधियों/समझौतों में शामिल हुए हैं।
  • बिलो 50 इनिशिएटिव: इसे वर्ल्ड बैंक कौंसिल फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (WBCAD) द्वारा आरम्भ किया गया था। इसका लक्ष्य ऐसे ईंधन के लिए माँग और बाजार का निर्माण करना है जो पारंपरिक जीवाश्म ईंधन की तुलना में 50% कम CO2 का उत्सर्जन करते हैं।

नुकसान और क्षति पर सुवा विशेषज्ञ संवाद

(Suva Expert Dialogue on Loss and Damage)

बॉन (BONN) में सुवा एक्सपर्ट डायलाग ऑन लॉस एंड डैमेज नामक विशेषज्ञ संवाद का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य नुकसान एवं क्षति (लॉस एंड डैमेज), संबंधित वित्तीय आवश्यकताओं एवं समर्थन के स्रोतों को संबोधित करने के प्रति दृष्टिकोणों की सामूहिक समझ में वृद्धि करना था।

सुवा विशेषज्ञ संवाद (Suva expert Dialogue)

  • यह एक विशेषज्ञ संवाद है। बॉन में आयोजित COP23 में विकासशील देशों द्वारा लॉस एंड डैमेज पर पृथक एजेंडे की मांग उठाए जाने के कारण इस संवाद के आयोजन का निर्णय किया गया।
  • इस संवाद का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों से संबद्ध लॉस एंड डैमेज को संबोधित करने के लिए विशेषज्ञता को जुटाने और प्राप्त करने की प्रक्रिया को सुगम करना तथा वित्त, प्रौद्योगिकी एवं क्षमता निर्माण जैसे सहयोग को बढ़ाना है। नुकसान और क्षति पर वारसा अंतरराष्ट्रीय तंत्र (Warsaw International Mechanism on Loss and Damage)
  • इसकी स्थापना वर्ष 2013 में COP-19 में UNFCCC के अंतर्गत की गई।
  • यह सुभेद्य देशों में, चरम घटनाओं तथा मंद गति से घटित होने वाली घटनाओं को समाविष्ट करने वाले जलवायु परिवर्तन प्रभावों (लॉस एंड डैमेज मैकेनिज्म) से संबंधित है।

इस सन्दर्भ में यह निम्नलिखित कार्य करता है:

  • लॉस एंड डैमेज को संबोधित करने के लिए व्यापक जोखिम प्रबंधन दृष्टिकोणों के विषय में ज्ञान एवं समझ को बढ़ाना;
  • प्रासंगिक हितधारकों के मध्य संवाद, समन्वय, सामंजस्य और सक्रियताओं को सशक्त करना;
  • वित्त, प्रौद्योगिकी एवं क्षमता निर्माण समेत कार्रवाई और समर्थन को बढ़ाना।

इसे 2015 के पेरिस समझौते के अनुच्छेद 8 में भी स्थान दिया गया है जो “जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभाव से संबद्ध लॉस एंड डैमेज को रोकने, कम करने और संबोधित करने के महत्व पर बल देता है।

UNFCCC में लॉस एंड डैमेज

  • 1991: इसे अलायन्स ऑफ़ स्माल आइलैंड स्टेट्स (AOSIS) की ओर से वानुअतु द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यह “आश्वासन” प्राप्त करने के लिए प्रस्तावित किया गया कि जलवायु परिवर्तन उनके अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न नहीं करेगा;
  • 2010: कानकुन (COP 16) में लॉस एंड डैमेज पर सब्सिडियरी बॉडी ऑफ़ इम्प्लीमेंटेशन (SBI) की स्थापना की कार्य योजना; •
  • 2013: कानकून अनुकूलन फ्रेमवर्क के अंतर्गत वारसा इंटरनेशनल मैकेनिज्म (WIM) की स्थापना;

लॉस एंड डैमेज से किस प्रकार निपटा जाए :

  • निम्न भूमि अपवाह प्रणाली के विकास, वानस्पतिक प्रतिरोधक बफर एवं अवरोध के रूप में कार्य करने वाले क्षेत्रों का निर्माण,गतिशील समुद्री संरक्षित क्षेत्रों के मानचित्रों का विकास और बाढ़ क्षेत्रों का मानचित्रण आदि द्वारा धीमी गति से आरम्भ होने वाली प्रक्रियाओं को प्रभावी रूप से संबोधित करना

विशेषकर छोटे द्वीपीय विकासशील राष्ट्रों से होने वाले प्रवासन और विस्थापन से निम्नलिखित उपायों के माध्यम से निपटना –

  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा उसके प्रबंधन में सुधार, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन उपायों एवं “सम्मानपूर्ण प्रवासन” पर
    नीति का विकास करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग जैसे-आपदा विस्थापन संबंधी मंच तथा सुरक्षित, व्यवस्थित एवं नियमित प्रवासन के लिए और शरणार्थियों
    के सम्बन्ध में वैश्विक समझौते।

सीमा पार आवागमन हेतु विधिक अंतरालों को समाप्त करना तथा साथ ही जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय और संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के नीतिगत क्षेत्र में इस मुद्दे को उठाना।

व्यापक जलवायु जोखिम प्रबंधन जिसमें सम्मिलित है:

  • संरचनात्मक उपायों (जैसे संकट प्रतिरोधी संरचनाओं को विकसित करने के लिए इंजीनियरिंग तकनीकों), गैर संरचनात्मक
    उपायों (जैसे जोखिमों और प्रभावों को कम करने के लिए ज्ञान, अभ्यास या समझौतों), विधायी उपायों (जैसे भवन निर्माण नियमावली और मानकों) या समय पूर्व चेतावनी प्रणालियों के माध्यम से जोखिम में कमी करना।
  • जलवायु जोखिम बीमा, आपदा बांड या जलवायु बांड के माध्यम से वित्तीय जोखिम अंतरण;
  • आकस्मिक ऋणों, आकस्मिकता और आरक्षित निधियों, आकस्मिक बजट और सामाजिक सुरक्षा के माध्यम से जोखिम
    प्रतिधारण;
  • प्रत्यास्थ पुनर्बहाली (Resilient recovery): आपदा पश्चात भविष्य में संभाव्य नुकसान और क्षति को रोकने या न्यूनीकृत | करने हेतु “बेहतर पुनर्निर्माण” (build back better) के माध्यम से :
  • अवशिष्ट नुकसान और क्षति को संबोधित करने के लिए परिवर्तनकारी दृष्टिकोण (जैसे-आजीविकाओं का विविधीकरण और
    प्रवासन)।

G-7 “इन्स्यु-रिज़ीलियेंस इनिशिएटिव” (InsuResilience Initiative) एवं G-20

“जलवायु और आपदा जोखिम वित्त एवं बीमा समाधानों के लिए वैश्विक भागीदारी” जैसी पहलों के माध्यम से जलवायु जोखिम बीमा। आवश्यकता इस बात की है कि लॉस एंड डैमेज वित्त की उपलब्धता लॉस एंड डैमेज के वैज्ञानिक मूल्यांकन, वित्तीय साधनों के विकास एवं ग्रीन हाउस गैसों (GHG) के उत्सर्जकों को उत्तरदायी बनाए जाने सहित UNFCCC के अन्दर एवं बाहर संस्थागत व्यवस्था में विद्यमान अंतरालों को समाप्त करने के बाद कराई जाए।

छोटे द्वीपीय विकासशील राष्ट्र (SIDS) और लॉस एंड डैमेज

  • ये 57 छोटे द्वीपीय देशों का एक समूह है। ये समान संधारणीय विकास की चुनौतियों को साझा करते हैं। इन चुनौतियों में छोटी
    किन्तु बढ़ती आबादी, सीमित संसाधन, दूर-दराज स्थिति और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अतिसंवेदनशीलता आदि सम्मिलित है।।
  • इन्हें सर्वप्रथम जून,1992 को पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में विकासशील देशों के एक विशिष्ट समूह के रूप में
    मान्यता प्रदान की गई थी।

छोटे द्वीप विकासशील राष्ट्रों (SIDS) पर लॉस एंड डैमेज का प्रभाव

जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल की 5वीं मूल्यांकन रिपोर्ट (IPCC-AR5) छोटे द्वीप विकासशील राष्ट्रों (SIDS) की विशिष्ट प्रभाविकता की व्याख्या को निम्नलिखित रूप से परिभाषित करती है।

समुद्र स्तर में वृद्धि (SLR):

  • समुद्र स्तर में वृद्धि (SLR) के तात्कालिक प्रभावों में सतही जल में लवणीय जल का अतिक्रमण, गंभीर तूफान महोर्मियों (storm surges) की तीव्रता में वृद्धि, तटीय भूमि में आप्लावन एवं बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि शामिल है।
  • समुद्र स्तर में वृद्धि (SLR) के दीर्घकालीन प्रभावों में अपरदन में वृद्धि, भूजल में लवणीयजल का अतिक्रमण और तटीय झीलों
    की आर्द्रभूमियों (लवणीय कच्छभूमियों, मैंग्रोव आदि) की संख्या में गिरावट आदि सम्मिलित है।
  • समुद्र जल स्तर में वृद्धि (SLR), ताजे जल की आपूर्ति (लवणीकरण के माध्यम से), खाद्य उपजों (कृषि-योग्य भूमि की हानि के
    माध्यम से) और भौतिक सुरक्षा (सड़कों, आवासन और सफाई व्यवस्थाओं जैसी तटीय अवसंरचना को क्षति के माध्यम से) को
    संकटग्रस्त करती है। इसके परिणामस्वरूप निम्न समुद्र तल वाले कई छोटे द्वीपीय राष्ट्रों से लोगों का विस्थापन होता है।

उष्णकटिबंधीय (और बाह्य उष्णकटिबंधीय) चक्रवात विभिन्न जोखिम उत्पन्न करते हैं। इन जोखिमों में कुछ वाहक, खाद्य और जल जनित रोग, जल की गुणवत्ता और मात्रा में गिरावट, अवसंरचना का विनाश एवं उर्वर कृषि भूमि का नुकसान, आजीविकाओं की हानि, तटीय बस्तियों, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और आर्थिक स्थिरता में गिरावट एवं प्रवाल भित्तियों के पारिस्थितिकी प्रणालियों की संभावित क्षति सम्मिलित है। कुछ छोटे द्वीपीय विकासशील राष्ट्रों (SIDS) के लिए उनका अस्तित्व ही समुद्र स्तर में वृद्धि (SLR) के कारण संकटग्रस्त हो सकता है।

महासागर अम्लीकरण जिसके परिणामस्वरूप प्रवाल की वृद्धि में कमी होती है और प्रवाल का कंकाल कमजोर होता है जिसका
तटीय संरक्षण और समुद्री जैव विविधता पर प्रभाव पड़ेगा।

चिंताएँ

  • संचार अंतरालों को संबोधित करने वाला, वित्तीय सहायता को सर्वाधिक आवश्यकता वाले लोगों तक पहुँचाने के लिए प्रभावी रूप
    से लक्षित करने वाला और जोखिम आकलन एवं कमी के संबंध में तकनीकी अंतराल को संबोधित करने वाला निष्पक्ष और उचित
    निवारण तंत्र अभी भी वास्तविकता में परिणत होना शेष है।
  • तकनीकी क्षमता की कमी एवं वित्त तक पहुंच के संदर्भ में जलवायु प्रबंधन के लिए वर्तमान तंत्र और वित्तीय साधन अपर्याप्त रहे हैं।
  • लघु एवं सीमांत कृषकों द्वारा वहनीय प्रीमियम की व्यवहार्यता की शर्तों और भुगतान (आपदा पश्चात चरम घटना या मौसम से
    संबंधित) की उपलब्धता के अभाव के कारण जलवायु आधारित बीमा प्रणाली की व्यवहार्यता पर संदेह
  • हानि और क्षति तंत्र में अंतराल जैसे-जलवायु मुद्दे को संबोधित करने हेतु कार्रवाई की धीमी गति।

निष्कर्ष

  • सुवा संवाद से यह अपेक्षा की जाती है कि यह नुकसान और क्षति को संबोधित करने हेतु दृष्टिकोणों की सामूहिक समझ को आगे
    बढ़ाने एवं विकासशील देशों में इन आवश्यकताओं को पूरा करने में विद्यमान अंतरालों को संबोधित करने के उद्देश्य से वित्त
    आवश्कताओं की पहचान करने में सहायता करेगा।
  • इसके अतिरिक्त, ऐसे क्षेत्र जिनसे वित्त संबंधी दृष्टिकोणों का अभी तक मेल-मिलाप नहीं किया गया है जैसे कि मंद गति से घटित
    होने वाली घटनाओं को संबोधित करना या जलवायु से संबंधित घटनाओं से पुनर्घाप्ति और पुनर्वास को भविष्य में ऐसे फोरमों के माध्यम से बेहतर रूप से संबोधित किया सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance : ISA)

अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन क्या है?

  • यह उन देशों का गठबंधन है, जो पूर्णतया या आंशिक रूप से कर्क रेखा एवं मकर रेखा के मध्य उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अवस्थित हैं। •
  • ऐसे देशों को सनशाइन देशों के रूप में जाना जाता है जिनमे भारत, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, कोमोरोस, फिजी इत्यादि देश
    शामिल हैं।
  • यह एक संधि आधारित अंतर-सरकारी संगठन (Treaty-based International Intergovernmental Organization) है।
    121 संभावित देशों में से अब तक 61 देशों ने ISA समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं और उनमें से 32 देशों ने इसकी अभिपुष्टि की है।
  • नवंबर 2015 में पेरिस में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP-21) के समानांतर मुख्य रूप से भारत और फ्रांस द्वारा संयुक्त रूप से इसका शुभारंभ किया गया था।
  • इसका मुख्यालय भारत में है। गुरुग्राम (हरियाणा) के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी में ISA का सचिवालय भी स्थित है

ISA का महत्व

  • इसका मुख्य उद्देश्य सौर वित्त, सौर प्रौद्योगिकियों, नवाचार, अनुसंधान एवं विकास और क्षमता निर्माण की मांगों में सामंजस्य | स्थापित करना और उन्हें संचित करना है।
  • इससे अपेक्षित है कि यह 2030 तक 1000 गीगावाट (GW) सौर ऊर्जा के अतिरिक्त उत्पादन में सहायक होगा।
  • इसके मुख्य लक्ष्यों में से एक लक्ष्य 2030 तक सौर ऊर्जा लिए 1000 बिलियन अमेरिकी डॉलर का संग्रह करना है। इसके साथ ही इसका लक्ष्य ऊर्जा की मांग को बढ़ाने एवं जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहायता करने के लिए विकासशील देशों में सौर ऊर्जा के बड़े पैमाने पर परिनियोजन को सुविधाजनक बनाना और उसे त्वरित करना है। यह सौर ऊर्जा पर पहला विशेषीकृत अंतर सरकारी निकाय है जिससे इस क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास को आगे बढाने (विद्युत् उत्पादन से भंडारण क्षमता तक) की अपेक्षा की जाती है।
  • यह सौर ऊर्जा के परिनियोजन के लिए विभिन्न स्रोतों से निवेश को एकत्रित करेगा। इसे पहले ही विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक
    (ADB) और यूरोपीय बैंक जैसी विभिन्न बहुपक्षीय एजेंसियों का समर्थन प्राप्त है।
  • यह वित्तीय तंत्र के माध्यम से लागत को कम करने, सार्वभौमिक ऊर्जा पहुंच को बढ़ावा देने और सदस्य देशों द्वारा उपयोग किए जाने वाले उत्पादों की उचित गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सामान्य मानकों के निर्माण में सहायता करने के महत्व पर बल देता है।
  • ISA के अधिकांश सदस्य देश एशिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और प्रशांत क्षेत्रों से हैं। ये क्षेत्र अधिक ऊर्जा की मांग के कारण हाइड्रोकार्बन के अभाव की स्थिति में हैं और अवसंरचना के अभाव, विनिर्माण क्षमता की कमी तथा उच्च ऊर्जा टैरिफ जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इसलिए, इन देशों के लिए वहनीय कीमतों पर नवीकरणीय ऊर्जा (RE) तक पहुंच प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए महत्व

  • यह भारत में स्थायी मुख्यालय स्थापित करने वाला पहला अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। इससे भारत को जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा (RE) और संधारणीय विकास के क्षेत्र में एक प्रमुख वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में स्वयं को स्थापित करने का अवसर प्राप्त होगा।
  • शिखर सम्मेलन के दौरान, भारत ने 15 देशों में 27 परियोजनाओं को आरंभ किया है जिससे इसकी वैश्विक भागीदारी के पैमाने और पहुंच में वृद्धि हुई है।
  • यह सौर ऊर्जा में निवेश के लिए भारत को और अधिक आकर्षक गंतव्य बनाएगा।
  • यह नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करने में भारत की सहायता करेगा। इस प्रकार, यह समयबद्ध रूप से जलवायु परिवर्तन की समस्या का समाधान करने और भारत की क्षमताओं में वैश्विक विश्वास को बढ़ावा देने में अपनी वैश्विक प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
  • इससे यह अपेक्षित है कि नवीकरणीय ऊर्जा में नवाचार को बढ़ावा देने और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों के माध्यम से सौर पैनलों जैसे नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों की स्वतंत्र विनिर्माण क्षमताओं को विकसित करने में सहायता करेगा।
  • इससे सौर प्रौद्योगिकी के उपयोग में व्याप्त प्रमुख कमियों को दूर करने की अपेक्षा की जाती है जिनमें ऑन-ग्राउंड आवश्यकताओं के बारे में व्यवस्थित सूचना का अभाव, क्षमता निर्माण और नई प्रौद्योगिकियों को वहनीय बनाने के लिए उचित वित्त पोषण का अभाव सम्मिलित है।

ISA हेतु कार्य बिंदु के रूप में पहचानी गई अल्पकालिक प्राथमिकताएं निम्नलिखित हैं:

  • सौर नीतियों को तैयार करने में सदस्य देशों की सहायता करना;
  • सौर परियोजनाओं के लिए 24/7 वास्तविक समय (रियल टाइम) सुझाव प्रदान करने के लिए ई-पोर्टल;
  • सामान्य मानकों, परीक्षण, निगरानी और सत्यापन प्रोटोकॉल के विकास के लिए विशेषज्ञ समूह का निर्माण करना;
  • सौर प्रकाश तक सार्वभौमिक पहुंच हेतु प्रयास करने के लिए ISA के सदस्य देशों के साथ कार्य करना;
  • जोखिम को कम करने और निवेश को बढ़ावा देने हेतु भागीदारी को उत्प्रेरित करने के लिए वित्त पोषण उपकरणों को डिजाइन करने में सदस्य देशों के साथ बेहतर प्रचलनों और कार्यों का आदान-प्रदान;
  • सदस्य देशों में सौर संसाधन मानचित्रण और उपयुक्त प्रौद्योगिकियों के परिनियोजन में सहयोग को प्रोत्साहित करना;
  • सौर ऊर्जा विकास और परिनियोजन के लिए योजनाओं को तैयारी की सुविधा प्रदान करना;
  • ISA सदस्य देशों के मध्य उद्योग आधारित सहयोग को प्रोत्साहित करना;
  • ISA सदस्य देशों में अनुसंधान एवं विकास के लिए उत्कृष्टता केंद्र के विकास पर सहयोगात्मक संपर्क स्थापित करना;
  • छात्रों / इंजीनियरों / नीति निर्माताओं, आदि के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करना और कार्यशालाओं, अभिकेंद्रित बैठकों और
    सम्मेलनों का आयोजन करना।

ISA द्वारा आरंभ किए गए कार्यक्रम और पहल

वर्ष 2016 से ISA ने अनेक पहले आरम्भ की हैं :

कृषि में सौर अनुप्रयोगों को बढ़ावा देना

  • इसका लक्ष्य विश्वसनीय, वहनीय और आवश्यकता के अनुरूप संशोधित किये गए सौर अनुप्रयोगों को ISA देशों के सभी
    किसानों की पहुंच के अंतर्गत लाना है।
  • यह ISA सदस्य देशों में कृषक समुदायों के लिए कृषि-उपज, अंतरिक्ष और जल गर्म करने, फसल सुखाने, ग्रामीण क्षेत्रों में
    आजीविका के अवसरों के निर्माण सहित विभिन्न मोर्चे पर सेवा प्रदान करने में सहायक होगा।

सौर ऊर्जा क्षेत्र में कम लागत वाली पूंजी के संग्रहण के लिए वहनीय वित्त की सुविधा प्रदान करना

  • विशेष रूप से द्वीपीय राष्ट्रों के साथ ISA राष्ट्रों के सौर उत्पादन क्षमता में सुधार के लिए सौर मिनी ग्रिड का प्रवर्द्धन करना।
  • ISA दो अन्य कार्यक्रमों की योजना बना रहा है: सदस्य देशों में आवासीय संस्थापनों (इंस्टालेशन) को व्यापक स्तर पर प्रसारित करने के लिए एक रूफटॉप सोलर कार्यक्रम और सोलर ई-मोबिलिटी एंड स्टोरेज।
  • गठबंधन ने वैश्विक सौर बाजारों में वित्तीय जोखिमों को कम करने के लिए एक साझा जोखिम न्यूनीकरण तंत्र (CRMM) व्यवहार्यता अध्ययन का भी शुभारंभ किया है। यह उपकरण पारस्परिक सार्वजनिक संसाधनों का विविधीकरण करेगा। इसके साथ ही यह अन्तर्निहित जोखिमों से बचाव के लिए एक संयुक्त पूल के निर्माण में सहायक होगा और महत्वपूर्ण निवेश का मार्ग प्रशस्त
    करेगा।
  • ISA ने 300 बिलियन डॉलर के ग्लोबल रिस्क मिटिगेशन फंड (वैश्विक जोखिम शमन निधि) के निर्माण के लिए अनेक वित्तीय
    संस्थानों को भी आमंत्रित किया है।

चुनौतियां

  • विभिन्न देशों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और बहुपक्षीय विकास बैंकों से पर्याप्त वित्त पोषण को सुनिश्चित करना
    चुनौतीपूर्ण बना हुआ है
  • यद्यपि विश्व भर में सौर संस्थापनाओं की लागत में कमी आ रही है। इसके बावजूद अनेक ISA देशों में यह लागत अभी भी उच्च बनी हुई है। अधिकांशतः अफ्रीकी देशों ने फोटो वोल्टेइक सेलो, मॉड्यूल्स और अर्द्धचालक उपकरणों पर उच्च प्रशुल्क दरें आरोपित की हैं। प्रशांत द्वीपीय राष्ट्रों द्वारा सौर उत्पादों का उच्चतम शुल्क निर्धारित किया गया है जिनमें से कुछ देशों ने तो इन उत्पादों पर 3040% की उच्चतम दर आरोपित की है।

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