भारत के पड़ोसी देशों के साथ नदी जल संबंध (India’s Water Relations with Neighbours)

  • भारत, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे देशों के साथ कई सीमापारीय नदियों को साझा करता है। भारत ने
    अपने संबंधित पड़ोसी देशों के साथ सफलतापूर्वक द्विपक्षीय नदी जल-साझाकरण संधियाँ प्रतिपादित की है किन्तु विभिन्न कारणों से अभी भी विवादों का समाधान नहीं हुआ है।
  • इन संधियों में मुख्यतः गंगा (बांग्लादेश-भारत), सिंधु (भारत-पाकिस्तान), और गंडक, महाकाली (भारत-नेपाल) नदियों के संधि
    आधारित साझाकरण प्रबंधन सम्मिलित हैं। गंडक और महाकाली बेसिन के प्रबंधन में साझा नदी के जल को विभाजित करने के लिए कोई फार्मूला तय नहीं किया गया है बल्कि यह जल की विशेष मात्रा की निकासी, स्थानान्तरण या उपयोग के अधिकारों पर केंद्रित
साउथ-नॉर्थ वाटर ट्रांसफर प्रोजेक्ट साउथ-नॉर्थ वाटर ट्रांसफर प्रोजेक्ट

तिब्बती जल को स्थानांतरित करने की चीन की एक परियोजना है।

  • इस परियोजना के प्रथम चरण के तहत तिब्बती पठार के पूर्वी छोर पर जिन्शा, यालॉन्ग और दादू नदियों से जल निकासी हेतु
    300 किलोमीटर लम्बी सुरंगों और चैनलों के निर्माण की योजना है।
  • द्वितीय चरण में, ब्रह्मपुत्र नदी के जल की दिशा को पुनः उत्तर की ओर परिवर्तित किया जा सकता है, जो कि निचले अपवाह क्षेत्रों में भारत और बांग्लादेश के लिए जल युद्ध की घोषणा के समान होगा।
  • बीजिंग ने उस स्थान (मोड़) को चिन्हित किया है जहां ब्रह्मपुत्र भारत में प्रवेश करने से पूर्व विश्व के सबसे लंबे और गहरे
    कैनियन का निर्माण करती है, जो कि जल और ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु सबसे बड़ा अप्रयुक्त भंडार है।

नदी जल प्रबंधन व्यवस्थाओं की स्थिति

इस क्षेत्र में भारत के लिए महत्वपूर्ण कुछ नदी जल प्रबंधन व्यवस्थाओं की स्थिति इस प्रकार हैं-

ब्रह्मपुत्र नदी और भारत-चीन-बांग्लादेश संबंध

ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत से होता है। इसका अधिकांश भाग चीन (ऊपरी अपवाह) द्वारा नियंत्रित होता है तत्पश्चात यह भारत (मध्य अपवाह) और बांग्लादेश (निचले अपवाह) से अपवाहित होते हुए हिन्द महासागर में गिरती है। सभी तीनों देशों की जल सुरक्षा के लिए यह नदी अत्यधिक महत्वपूर्ण है, किन्तु उनमें से प्रत्येक के लिए इसके निहितार्थ भिन्न हैं।

चीन के लिए

  •  ब्रह्मपुत्र, चीन के लिए जलविद्युत विकास योजनाओं और घरेलू जल की कमी का समाधान करने हेतु महत्वपूर्ण है। चीन द्वारा
    अपनी दक्षिण-उत्तर जल परिवहन परियोजना के माध्यम से ब्रह्मपुत्र पर बांध बनाने और नदी जल की दिशा परिवर्तित करने
    की योजना बनाई गयी है।
  • भारत-चीन के मध्य संचार और सामरिक विश्वास को सुदृढ़ता प्रदान करने हेतु कई समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए जाने के
    बावजूद यह दोनों पड़ोसी देशों के मध्य तनाव का स्रोत है।
  • इसके अतिरिक्त चीन, भारत और बांग्लादेश के साथ विस्तृत-बेसिन सहयोग में शामिल होने के लिए अनिच्छुक है, परन्तु
    सम्भवतः सूचना साझा करने और तकनीकी चुनौतियों के आधार पर बहुपक्षीय सहयोग हेतु तैयार है।

भारत के लिए

  • ब्रह्मपुत्र, भारत में केवल तीन प्रतिशत क्षेत्र से होकर ही अपवाहित होती है लेकिन इसका जल पूर्वोत्तर में निवास करने वाली
    आबादी के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
  • मध्यवर्ती अपवाह के रूप में भारत की नीतियां चीन और बांग्लादेश की तुलना में भिन्न हैं। ये नीतियां चीन की बांध बनाने और
    संभवतः नदी के मार्ग को परिवर्तित करने की योजना, भारत द्वारा अपने नदी संबंधी अधिकारों की प्राप्ति की इच्छा तथा विद्युत् उत्पादन और बांध बनाकर पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ एवं मृदा के कटाव को नियंत्रित करने की इसकी आवश्यकता पर निर्भर करती हैं।
  • भारत द्वारा अपने क्षेत्र में, शुष्क ऋतु के दौरान ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी तीस्ता के अपवाह का उपयोग करने के उद्देश्य से इस | पर बांध बनाए गए हैं। यह बांग्लादेश की सिंचाई संबंधी आवश्यकताओं हेतु आवश्यक जल आपूर्ति को बाधित कर सकते हैं। ध्यातव्य है कि बांग्लादेश, बंगाल की खाड़ी में गिरने से पूर्व ब्रह्मपुत्र नदी का अंतिम पड़ाव है।
  • भारत की बांग्लादेश के साथ ब्रह्मपुत्र से संबंधित चिंताएं उसके अन्य देशों के साथ व्यापक संबंधों का ही भाग हैं जिन्हें संयुक्त नदी आयोगों (JRC) तथा तीस्ता एवं गंगा नदी पर विशिष्ट समझौतों के माध्यम से संचालित किये जा रहे हैं।

बांग्लादेश के लिए

  • ब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदियों के ऊपरी अपवाह पर स्थित पड़ोसी देशों द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियों से अधिकतम संभावित खतरे का सामना बांग्लादेश को करना पड़ता है क्योंकि इसकी आबादी देश की सीमा के बाहर से उद्गमित नदियों के जल पर अत्यधिक निर्भर है।
  • बांग्लादेश चीन की बांध-निर्माण योजनाओं और पारदर्शिता की कमी की तुलना में भारत की नदियों से संबंधित विभिन्न गतिविधियों को अधिक सतर्कतापूर्वक देखता है। इन गतिविधियों में मुख्यतः नदी जोड़ो परियोजना, असफल तीस्ता समझौता, वर्तमान नदी-जल मार्ग परिवर्तन योजना, गंगा नदी के संसाधनों का उपभोग आदि शामिल हैं।
  • इन गतिविधियों के कारण शुष्क मौसम में अपवाह में कमी एवं लवणता में वृद्धि की समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
  • इस नदी से संबंधित तीनों देशों में से बांग्लादेश ब्रह्मपुत्र बेसिन के विकास और प्रबंधन हेतु बहुपक्षीय सहयोग का सर्वाधिक सुदृढ़ता से समर्थन करता है।
  • हाल ही में, भारत और बांग्लादेश के संबंधों में सुधार हुआ है। इस मैत्रीपूर्ण स्थिति में तीस्ता नदी समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने की आशा व्यक्त की जा रही है। इसके माध्यम से दोनों देशों के मध्य अन्य सकारात्मक वार्ताओं हेतु उपयुक्त परिवेश के निर्माण की भी आशा है।
  • हाल ही में, संयुक्त नदी आयोग (JRC) द्वारा दोनों देशों को मिलकर कार्य करने और प्रबन्धन करने में सक्षम बनाने की योजना | के निर्माण के साथ ही भारत और बांग्लादेश के मध्य 10 अन्य सीमापारीय नदियों की औपचारिक पहचान की गयी है।

भारत-बांग्लादेश जल सहयोग

  • भारत और बांग्लादेश के मध्य 54 नदियां साझा होती हैं लेकिन दोनों देशों द्वारा केवल एक द्विपक्षीय नदी जल साझाकरण संधि (गंगा नदी के लिए) संपन्न की गयी है।
  • गंगा नदी के जल के साझाकरण हेतु 1996 में संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके तहत पारस्परिक सहमति से तीस वर्ष की अवधि के पश्चात संधि का पुनः नवीकरण करने का प्रावधान शामिल किया गया था। संधि के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए एक संयुक्त समिति की स्थापना की गई है।
  • किन्तु बांग्लादेश का आरोप है कि फरक्का बैराज (भारत) के बनने के बाद हार्डिंग ब्रिज (बांग्लादेश) में शुष्क मौसम के समय जल प्रवाह में उल्लेखनीय गिरावट हो जाती है जिससे बांग्लादेश के कृषि और संबद्ध क्षेत्रों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
  • दोनों देशों के मध्य नदी जल विभाजन संबंधी चुनौतियों के समाधान हेतु 1972 से ही एक भारत-बांग्लादेश संयुक्त नदी आयोग (JRC) कार्यरत है। इसकी स्थापना साझी नदी प्रणालियों से अधिकतम लाभ प्राप्त करने हेतु प्रभावी संयुक्त प्रयास सुनिश्चित करने के लिए संपर्क बनाए रखने के उद्देश्य से की गयी थी।
  • JRC की अध्यक्षता दोनों देशों के जल संसाधन मंत्रियों द्वारा की जाती है।
  • छह अन्य नदियों अर्थात् मानू, मुहरी, कोवई, गुमती, जलढ़ाका और तोरसा के अतिरिक्त तीस्ता और फेनी नदियों के जल के बंटवारे को लेकर बांग्लादेश के साथ चर्चा चल रही है।
  • मानसून के मौसम के दौरान भारत से बांग्लादेश की ओर गंगा, तीस्ता, ब्रह्मपुत्र और बराक जैसी प्रमुख नदियों के संबंध में बाढ़ पूर्वानुमान आंकड़ों के प्रेषण हेतु एक प्रणाली की स्थापना भी की गयी है।

भारत और नेपाल जल संबंध

  • भारत और नेपाल के मध्य कोसी समझौते पर 1954 में हस्ताक्षर किए गए थे, लेकिन बाद में दोनों सरकारों के मध्य वार्ता रोक दी गई और जल अधिकार संबंधी मुद्दों का उचित रूप से समाधान नहीं किया गया। 2008 और 2014 में बिहार में आयी भीषण बाढ़
    का प्रमुख कारण कोसी नदी ही थी।
  • भारत और नेपाल ने 1996 में, महाकाली संधि पर भी हस्ताक्षर किए। पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना का कार्यान्वयन महाकाली संधि का केंद्र बिंदु है। परियोजना स्थल का पर्यवेक्षण (field investigations) पूर्ण कर लिया गया है लेकिन पंचेश्वर परियोजना के परस्पर स्वीकार्य DPR को अभी तक अंतिम रूप दिया जाना शेष है। वर्तमान में इसके लिए पर्यावरणीय मंजूरी प्रगति पर है।
  • इसकी संरचना की निगरानी से संबंधित संधि के संदिग्ध प्रावधानों के कारण पंचेश्वर बांध परियोजना को अभी तक कार्यान्वित नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त, नेपाल में इस बांध के निर्माण के संबंध में व्यापक जन असंतोष व्याप्त है।
  • सप्त-कोसी उच्च बांध परियोजना और सन कोसी स्टोरेज कम डाइवर्जन स्कीम, कमला और बागमती बहुउद्देशीय परियोजनाएं और करनाली बहुउद्देशीय परियोजना आदि दोनों देशों के मध्य विचार-विमर्श के विभिन्न चरणों में हैं।

नेपाल भारत मैत्री परियोजना

  • भारत ने हाल ही में नेपाल को 9.9 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की है।
  • यह अनुदान 2017 में प्रारंभ नेपाल-भारत मैत्री सिंचाई परियोजना का एक भाग है।
  • मैत्री परियोजना का लक्ष्य देश के दक्षिणी तराई क्षेत्र के 12 जिलों में 2,700 कम गहराई वाली ट्यूबवेल सिंचाई प्रणालियों का निर्माण करना है।
  • यह परियोजना लगभग 8,115 हेक्टेयर कृषि भूमि के लिए सभी मौसमों में सिंचाई की सुविधा को सुनिश्चित करेगी तथा गेहूं, चावल, मौसमी फलों, सब्जियों और अन्य फसलों की उत्पादकता बढ़ाने एवं परिवारों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान में सहायता करेगी।

भारत भूटान संबंध

  • दोनों देशों द्वारा “कोम्प्रीहेंसिव स्कीम फॉर इस्टैब्लिशमेंट ऑफ़ हाइड्रो मीटिअरोलॉजिकल एंड फ्लड फोरकास्टिंग नेटवर्क ऑन रिवर्स कॉमन टू इंडिया एंड भूटान” (Comprehensive Scheme for Establishment of Hydro-meteorological and Flood Forecasting Network on rivers Common to India and Bhutan) योजना को संचालित किया जा रहा है। इस नेटवर्क के अंतर्गत भूटान में अवस्थित 32 हाइड्रो मीटिअरोलॉजिकल स्टेशन शामिल हैं तथा भारत से प्राप्त वित्तीय सहायता के माध्यम से भूटान की शाही सरकार द्वारा इनका रख-रखाव किया जा रहा है। इन स्टेशनों से प्राप्त आंकड़ों का भारत में बाढ़ के पूर्वानुमान हेतु उपयोग किया जाता है।
  • भारत और भूटान के मध्य बाढ़ प्रबंधन पर विशेषज्ञों का एक संयुक्त समूह (Joint Group of Experts: JGE) गठित किया गया है। इसका उद्देश्य भूटान के दक्षिणी तलहटी वाले क्षेत्रों और इससे संलग्न भारत के मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की पुनरावृति और अपरदन के संभावित कारणों एवं प्रभावों के संबंध में विमर्श एवं आंकलन करना है। यह दोनों सरकारों को उचित और परस्पर स्वीकार्य
    उपचारात्मक उपायों की अनुशंसा करता है।

भारत पाकिस्तान संबंध

  • भारत और पाकिस्तान के मध्य पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चेनाब) पर जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण से संबंधित कई
    विवाद के मुद्दे विद्यमान हैं। इन नदियों के जल के उपयोग संबंधी अधिकार 1960 में, सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर करने के पश्चात पाकिस्तान को सौंप दिए गए।
  • यद्यपि यह संधि भारत को सीमापारीय प्रवाह को वास्तविक रूप से परिवर्तित करने से प्रतिबंधित करती है तथापि यह पाकिस्तान
    के प्रयोग हेतु निर्धारित नदियों पर भारतीय सीमा में मध्यम आकार की रन-ऑफ़-रीवर परियोजनाओं के संचालन की अनुमति | प्रदान करती है। इसके बावजूद, भारत द्वारा इस प्रकार के जलविद्युत संयंत्रों के निर्माण के विलंबित प्रयासों के कारण पाकिस्तान में
    जलीय राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न हुई है।
  • दोनों देशों के बीच के बगलिहार बांध विवाद को इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन तक ले जाया गया। इसके अतिरिक्त किशनगंगा,
    रातले परियोजना आदि दोनों देशों के मध्य विवाद के अन्य प्रमुख मुद्दे हैं।

जल से संबंधित प्रमुख मुद्दे

  • पुरानी संधि: भारत और अन्य देशों के मध्य लगभग सभी द्विपक्षीय जल संधियाँ 1960 और 70 के दशक में हस्ताक्षरित की गयी हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन के प्रभाव में जल अभाव की चुनौतियों के सामने आने और वर्षा प्रतिरूप में अत्यधिक भिन्नता के कारण जल सम्बन्धी दबाव में वृद्धि की अपेक्षा नहीं की गयी थी।
  • क्षेत्रीय भू-राजनीति: दक्षिण एशियाई सीमापारीय मुद्दों को क्षेत्रीय भू-राजनीति से अविभक्त रूप से जुड़े हुए हैं क्योंकि सभी मुख्य अंतर-देशीय नदी प्रणाली हिमालय की परिधि में ही स्थित हैं। साथ ही यह उन देशों को सम्मिलित करती हैं जो आकार एवं शक्ति में असमान हैं और पिछले छह दशकों से विभिन्न मुद्दों पर परस्पर संघर्षरत हैं।
  • भारत के घरेलू जल विवादः 2016 में दिल्ली में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय नदी संगोष्ठी के दौरान कई जल विशेषज्ञों द्वारा न्यायसंगत नदी जल साझाकरण प्रबंधन पर चर्चा की प्रभावशीलता पर चिंता व्यक्त की गयी। साथ ही उन्होंने इस मुद्दे को भी उठाया कि केंद्र के प्रयासों के बावजूद भारत का संघीय ढांचा तीस्ता समझौते सहित महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संधियों को अवरोधित कर रहा है।
  • बहुपक्षीय नदी जल साझाकरण प्रबंधन का अभावः बांध निर्माण और नदी मार्ग में परिवर्तन संबंधी गतिविधियों के कारण उत्पन्न
    क्षेत्रीय सुरक्षा से संबंधित चिंताओं के बावजूद, कुछ अपवादों को छोड़कर दक्षिण एशियाई क्षेत्र में कोई द्विपक्षीय या बहुपक्षीय जल प्रबंधन समझौता विद्यमान नहीं है।
  • पारस्परिक अविश्वास: भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन के मध्य विद्यमान सीमा विवाद और इनके मध्य हुए युद्धों के कारण परस्पर अविश्वास और संदेह की परम्परा विकसित हो गयी है।
  • उभरती चुनौतियां: दक्षिण एशियाई क्षेत्र में जल के अभाव और कृषि संबंधी कठिनाइयां विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त भविष्य में इस क्षेत्र को तीव्र औद्योगीकरण के कारण ऊर्जा एवं जल की मांगों में वृद्धि से सम्बंधित चुनौतियों का भी सामना करना होगा। भूजल का अत्यधिक दोहन, लवणता और आर्सेनिक प्रदूषण आदि सिंधु-गंगा के मैदान में 60 प्रतिशत भूजल को प्रभावित करता है।
  • जलवायु परिवर्तनः जलवायु परिवर्तन के कारण विभिन्न सीमापारीय नदी बेसिनों की जल की मात्रा में कमी होने और जल के अपवाह प्रतिरूप के परिवर्तित होने की संभावना है।

सूचना साझाकरण का अभाव : 

एशिया फाउंडेशन की रिपोर्ट, स्ट्रेंथनिंग ट्रांसपरेंसी एंड ऐक्सेस टू इन्फॉर्मेशन ऑन ट्रांसबाउण्ड्री रिवर्स’ के तहत वर्णित किया गया है:

  • दक्षिण एशिया में सीमापारीय जल प्रबंधन और सहयोग का अत्यधिक राष्ट्रवादी, तकनीकी और उत्साहपूर्ण ढंग से प्रतिभूतिकरण किया जाता है जिसमें जल सम्बन्धी आंकड़ों और सूचनाओं को सरकारी विभागों द्वारा एकत्रित किया जाता है और खंडित तरीके से रखा जाता है। यहाँ सूचनाओं को ‘नदी बेसिन’ स्तर पर व्यवस्थित रूप से एकत्र नहीं किया जाता है।
  • इसके अतिरिक्त, जिन देशों के साथ बेहतर संबंध हैं उनके साथ जल संबंधी सूचनाएं अनौपचारिक रूप से साझा की जाती हैं।

अन्य मुद्देः नदी जल-साझाकरण विवाद, भोजन, जल और ऊर्जा के मध्य जटिल संबंध के कारण उत्पन्न होते हैं तथा वर्तमान समय में ‘जल’ राष्ट्रीय सुरक्षा, राजनीतिकरण, अक्षमता और अविकसित जल प्रशासन संस्थानों का विषय बन गया है।

सुझाव

वर्तमान में जल को भारत में और भारत के बाहर एक ‘जीरो-सम रिसोर्स’ (zero-sum resource ) के रूप में देखा जाता है। जब तक जल का बंटवारा पारस्परिक साझाकरण, पारदर्शिता और प्रभावी शासन के माध्यम से नहीं किया जाएगा, नदी जल साझाकरण विवाद के समाधान के सन्दर्भ में घरेलू और सीमापारीय स्तर पर कोई विशेष प्रगति नहीं की जा सकती।

घरेलू स्तर पर:

  • उपर्युक्त विशिष्ट मुद्दों का समाधान करने की आवश्यकता है। स्थायी विवाद प्राधिकरण की स्थापना कुछ हद तक इन मुद्दों का
    समाधान कर सकती है।
  • चूंकि अंतर-राज्यीय विवाद मुख्य रूप से अंतरराज्यीय नदियों पर बांध निर्माण के कारण उत्पन्न होते हैं, अतः जहाँ तक संभव
    हो उचित नियंत्रण और संतुलन के माध्यम से इन मुद्दों की समीक्षा एवं समाधान किये जाने की आवश्यकता है।

सीमापारीय स्तर पर:

  • डेटा और सूचना के स्पष्ट विनिमय के लिए तंत्र और प्रक्रियाओं के साथ एक क्षेत्रीय जल प्रशासन संस्थान का निर्माण किया
    जाना चाहिए। इस संबंध में एक क्षेत्रीय सीमापारीय नदी जल साझाकरण नीति का प्रारूप तैयार किया जाना चाहिए और इसे कार्यान्वित किया जाना चाहिए।
  • भारत में जल राज्य सूची का विषय है तथापि सीमापारीय नदी जल साझाकरण के मामले में राज्यों को केवल सीमित शक्तियां
    दी जानी चाहिए। इससे अन्य राष्ट्रीय सरकारें केंद्र सरकार के साथ वार्ता करने के लिए प्रेरित होंगी।
  • जल संरक्षण और जल से संबंधित डेटा तक सार्वजनिक और संस्थागत पहुंच बढ़ाने के प्रयास किए जाने चाहिए।
  • अंत में, सीमापारीय समझौतों के सफल कार्यान्वयन के लिए – प्रत्येक देश की नीतियों, कानूनों, संसाधनों और प्रबंधन प्रचलनों
    को एक-दूसरे के साथ सुसंगत बनाया जाना चाहिए तथा आंतरिक जल प्रबंधन के स्थायीकरण हेतु प्रयास किए जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त, सीमापारीय नदी जल प्रबंधन को बिल्डिंग ब्लॉक अप्रोच (building block approach) के माध्यम से बढ़ाया
    जाना चाहिए।

विद्युत् और स्थिर जल स्तर की बढ़ती आवश्यकता के तहत भविष्य में द्विपक्षीय नदी जल-साझाकरण संधि पर पुनर्विचार होना चाहिए। पड़ोसी देशों को भारत के साथ सहयोग के संभावित क्षेत्र के रूप में जल विद्युत पर विचार करने और जलविद्युत डेटा साझा करने की उचित विधियों का पता लगाने हेतु कार्य करना चाहिए। साथ ही इन्हें भारत के साथ विभिन्न नदियों पर मानवीय और पारिस्थितिकीय सहयोग का विस्तार करने की आवश्यकता है।

BCIM जैसे व्यापक बेसिन तंत्र आधारित समूहों का निर्माण (चीन, बांग्लादेश, भारत और म्यांमार के बीच संबंध) क्षेत्र की सामान्य विरासत के भाग के रूप में हिमालयी हिमनदों के संरक्षण और निगरानी से संबंधित अनुसंधान और कार्यवाही करने में सहायक हो सकता है। ताजा जल एक बहुमूल्य संसाधन और एक सामरिक संपत्ति है और भूराजनीति में इसके महत्व को कम नहीं आंका जा सकता है।

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