दिव्यांगजन (Person With Disabilities)

सार्वजनिक संस्थानों को दिव्यांगजन-अनुकूल बनाने के निर्णय का अनुपालन नहीं किए जाने पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार की आलोचना की गयी है।

सन्दर्भ

  • दिव्यांगजन (PwD) अपने दैनिक जीवन में कलंकित और आत्म-सम्मान में हीनता का अनुभव करते हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 41, राज्य को अपनी आर्थिक क्षमता और विकास स्तर की सीमाओं के भीतर दिव्यांग जनों के लिए शिक्षा, कार्य और सार्वजनिक सहायता के अधिकार को सुनिश्चित करने हेतु प्रभावी प्रावधान करने के लिए अधिदेशित करता है।
  • 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में दिव्यांगजनों की संख्या 2.68 करोड़ है जो कुल जनसंख्या का 2.21% हैं। हालांकि, यह अनुमान वास्तविक संख्या से कम हो सकता है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व की 15% जनसंख्या विकलांगता के किसी न किसी स्वरूप से ग्रसित है।
  • दिव्यांगजन (PwD) का सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण एक अंतर-क्षेत्रीय मुद्दा है। हालांकि, इस पर विभिन्न मंत्रालयों और विभागों द्वारा पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD), जो राष्ट्रीय स्तर पर PwD से संबंधित मुद्दों के लिए नोडल विभाग है, दिव्यांगजनों हेतु कई योजनाओं का संचालन करता है।
  • हालाँकि, इनमें से कई योजनाओं के लिए अत्यधिक कम संसाधन आवंटित किए गए हैं और आवंटित संसाधनों का पूर्ण उपयोग भी नहीं किया जाता है। विभाग की निगरानी क्षमता सीमित है जो एक बड़ी चुनौती है क्योंकि कई योजनाएं गैर सरकारी
    संगठनों के माध्यम से क्रियान्वित की गयी हैं।

विधायी सुधार – दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016

अधिनियम के प्रावधान

  • यह विकलांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 को प्रतिस्थापित करता है।
    यह दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के सिद्धांतों के अनुरूप है और दिव्यांग अनुकूल कार्यस्थल स्थापित करने हेतु प्रोत्साहन को लक्षित करता है।
  • दिव्यांगता के स्वरूपों की मौजूदा संख्या 7 से बढ़ाकर 21 कर दी गयी है और इन स्वरूपों की संख्या में और अधिक वृद्धि करने की शक्ति केंद्र सरकार को प्रदान की गयी है।
  • ‘बेंचमार्क दिव्यांगता (benchmark disabilities) से ग्रस्त व्यक्तियों से तात्पर्य उन व्यक्तियों से है जो अधिनियम द्वारा विनिर्दिष्ट कम से कम 40 प्रतिशत विकलांगता से ग्रसित हैं।
  • बेंचमार्क दिव्यांगता से ग्रस्त दिव्यांगजनों के लिए उच्च शिक्षा, सरकारी नौकरियों, भूमि आवंटन, गरीबी उन्मूलन योजनाओं आदि में आरक्षण जैसे अतिरिक्त लाभ उपलब्ध कराए गए हैं।
  • 6 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के बेंचमार्क दिव्यांगताग्रस्त बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होगा। सरकारी प्रतिष्ठानों की रिक्तियों में आरक्षण निर्दिष्ट व्यक्तियों या बेंचमार्क दिव्यांगताग्रस्त दिव्यांगजनों के वर्ग के लिए 3% से बढ़ा कर 4% कर दिया गया है।
  • अब इसके दायरे में निजी प्रतिष्ठानों को भी लाया गया है। यद्यपि इसमें निजी प्रतिष्ठानों में दिव्यांगजनों को नियुक्त करने की | अनिवार्यता नहीं है। अधिनियम के तहत निजी प्रतिष्ठानों पर कुछ बाध्यकारी दायित्व आरोपित किए गए हैं।
  • केंद्र और राज्य स्तर पर दिव्यांगता संबंधी नीति बनाने वाले शीर्ष निकायों के रूप में व्यापक आधार वाले केंद्रीय और राज्य सलाहकार बोर्डों की स्थापना करने का प्रावधान किया गया है।
  • दिव्यांगजनों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय और राज्य निधि का निर्माण किया जाएगा।
  • प्रधानमंत्री के सुगम्य भारत अभियान को सशक्त बनाने के लिए, सार्वजनिक भवनों (सरकारी और निजी दोनों) में निर्धारित
    समय-सीमा में दिव्यांगजनों के लिए आसान आवागमन सुनिश्चित करने पर बल दिया गया है।
  • यह दिव्यांगजनों के विरुद्ध किए गए अपराधों और नए कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर जुर्माने का भी प्रावधान
    करता है। दिव्यांगजनों के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों के निपटान हेतु प्रत्येक जिले में विशेष न्यायालय गठित किए
    जाएंगे।

सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign)

  • यह दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD) का राष्ट्रव्यापी अभियान है।
  • इस अभियान का उद्देश्य पूरे देश में दिव्यांगजनों के लिए बाधा मुक्त और अनुकूल परिवेश का निर्माण करना है।
  • यह विकलांगता (दिव्यांगता) के सामाजिक मॉडल के सिद्धांत पर आधारित है। इसके अनुसार ‘विकलांगता का कारण समाज के संगठन की व्यवस्था होती है, न कि व्यक्ति की सीमाएँ और दुर्बलताएँ।
  • इसे तीन ऊध्र्वाधर वर्गों में बांटा गया है: परिवेश; परिवहन तथा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) वातावरण का
    निर्माण।

सकारात्मक पक्ष

  • अधिकार आधारित दृष्टिकोण: यह कानून भारत में अनुमानित 70-100 मिलियन दिव्यांग नागरिकों के लिए गेम चेंजर सिद्ध होगा। यह कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के प्रावधानों के साथ परोपकार आधारित दृष्टिकोण को अधिकार आधारित दृष्टिकोण से प्रतिस्थापित करने में सहायक सिद्ध होगा।
  • व्यापक कवरेज: दिव्यांगता के स्वरूपों की सूची 7 से बढ़ाकर 21 कर दी गई है और दिव्यांगता को व्यापक रूप में परिभाषित किया गया है। मानसिक विक्षिप्तता की अवधारणा को भी व्यापक बनाया गया है और इसे बौद्धिक अक्षमता के रूप में
    परिवर्तित कर दिया गया है, जो वर्तमान समय के साथ अधिक समन्वयपूर्ण है।
  • भेदभाव परिभाषित किया गया: 2016 का अधिनियम ‘भेदभाव’ को परिभाषित करता है जो पूर्व विधानों में नहीं किया गया
    था। हालांकि, अधिनियम द्वारा रोजगार में गैर-भेदभाव संबंधी प्रावधानों के निर्माण की अनिवार्यता को केवल सरकारी प्रतिष्ठानों पर लागू किया गया है।
  • इसके द्वारा बौद्धिक और बहु-दिव्यांगता (multiple disabilities) से ग्रसित व्यक्तियों को रिक्तियों में आरक्षण की अनुमति प्रदान की गयी है, जो पूर्व में नहीं थी।
  • 2016 का अधिनियम संपत्ति का अधिकार देकर और विधिक क्षमता की स्वीकृति प्रदान कर, दिव्यांगजनों के आर्थिक और
    सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।

आलोचना

  • आरक्षण: अधिनियम के दायरे में जब अधिक संख्या में दिव्यांगताएं शामिल की जा रही हैं, तो आरक्षण का प्रतिशत भी उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए। यद्यपि, अधिनियम में केवल 4% आरक्षण का प्रावधान किया गया है (2014 के विधेयक में 5% प्रस्तावित किया गया था)।
  • वित्तीय स्रोत: अधिनियम के विभिन्न पहलुओं को लागू करने के लिए वित्त पोषण के तरीके की विशिष्टता, जिसमें राज्य और केंद्रीय स्तर पर मंत्रालयों और संगठनों को आवंटित दिव्यांगता बजट शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, आय की किसी ऊपरी सीमा या गरीबी रेखा संबंधी मानदंडों के बिना, दिव्यांगजनों को यथासंभव एक सीमा तक निःशुल्क आधारभूत सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
  • बीमा: दिव्यांगजनों के बीमा से संबंधित प्रावधान विधेयक में स्पष्ट रूप से सम्मिलित किए जाने चाहिए। समिति द्वारा बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम,1999 में संशोधन करने की सिफारिश की गयी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बीमा कंपनियां अन्य की तुलना में दिव्यांगजनों के लिए उच्च प्रीमियम आरोपित न करें।
  • समयबद्ध निस्तारण : विशेष न्यायालयों में मामलों के निस्तारण हेतु विशिष्ट समय सीमा।

आगे की राह

कुछ संस्थागत सुधार किए जाने चाहिए जैसे-

  • दिव्यांगजनों के लिए सशक्त और अधिक प्रत्यक्ष भूमिका निभाने के लिए सभी स्तरों पर संस्थागत ढांचे को सुदृढ़ बनाना
    महत्वपूर्ण है।
  • दिव्यांगजनों हेतु विशिष्ट पहलों के उत्तरदायित्व को संदर्भित मंत्रालयों के दायरे में लाया जाना चाहिए। उदाहरण के
    लिए, सभी शिक्षा संबंधी मामलों को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन होना चाहिए।
  • DEPwD द्वारा प्रशासित अधिकांश योजनाओं को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए। पर्याप्त बजटीय आवंटन के साथ
    सीमित संख्या में योजनाएं होना बुद्धिमानी होगी तथा इनका क्रियान्वयन और निगरानी प्रभावी ढंग से की जा सकेगी।
  • केंद्रीय और राज्य आयुक्तों के कार्यालयों की वित्तीय और मानव संसाधन क्षमता को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है ताकि वे अपने कार्यों को अधिक प्रभावी ढंग से संपन्न कर सकें। न्यूनतम कर्मचारी स्तर पर भी दिशानिर्देश लागू किए जाने चाहिए।
  • रोजगार क्षमता में वृद्धि- दिव्यांगजनों को कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। इसे सुनिश्चित करने के तरीकों में से एक तरीका निजी क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुसार दिव्यांगजनों के लिए समर्पित ITI केंद्र स्थापित करना है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय विकलांग वित्त और विकास निगम (NHFDC) द्वारा दिव्यांगजनों को स्वरोजगार संबंधी प्रशिक्षण देने के लिए पूर्वोत्तर में एक केंद्र के साथ पांच केंद्रों की स्थापना की जानी चाहिए।
  • दिव्यांगजनों की सहायक साधनों तक पहुंच में सुधार- गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों को सहायता देने में प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि इनका एक बड़ा प्रतिशत आयु आधारित विकलांगता से पीड़ित है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अद्वितीय दिव्यांगता पहचान पत्र (UDID) परियोजना शुरू की जानी चाहिए। यह अंततः पूरे देश में दिव्यांगजनों का इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस तैयार करने में सहायता करेगा।
  • शिक्षा को सुदृढ़ बनाना – शिक्षा के अधिकार अधिनियम द्वारा दिव्यांग बच्चों के प्रवेश और प्रतिधारण पर विशेष ध्यान देने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी, हालाँकि इसके बावजूद स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है। NCERT के एक अध्ययन में पाया गया कि सभी राज्यों के स्कूलों में दिव्यांग बच्चों को अभी भी अवसंरचना और अध्यापन संबंधी गंभीर अभावों का सामना करना पड़ रहा है। इन चुनौतियों में रैंप और दिव्यांग अनुकूल शौचालयों की अनुपस्थिति के साथ-साथ विशेष शिक्षण सामग्री और संवेदनशील शिक्षकों की कमी भी शामिल है।

यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि स्कूलों में यूनिवर्सल डिज़ाइन गाइडलाइन्स के तहत प्रत्येक कक्षा का कम से कम एक अनुभाग दिव्यांग विद्यार्थियों हेतु अवश्य उपलब्ध हो। इसके अतिरिक्त,शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में संवेदनशीलता पर एक मॉड्यूल अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए।

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Thanks for visiting IASbook