अनुसूचित जाति (SC) तथा अनुसूचित जनजाति (ST)

अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम

[Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act]

सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के सम्बन्ध में निर्देश जारी किए।

  • यह अनुसूचित जाति तथा जनजाति के सदस्यों के विरुद्ध अत्याचारों का निषेध करता है, तथा ऐसे अपराधों की सुनवाई तथा
    पीड़ितों के पुनर्वास हेतु विशेष न्यायालयों की स्थापना करता है।
  • यह गैर-अनुसूचित जाति/जनजाति सदस्यों द्वारा SC/ST के सदस्यों के विरुद्ध किये जाने वाले उन कृत्यों को रेखांकित करता है जिन्हें अपराध के रूप में माना जायेगा।
  • इस अधिनियम में यह स्पष्ट किया गया है कि एक गैर-अनुसूचित जाति / जनजाति समूह से सम्बंधित लोक सेवक यदि SC/ST से संबंधित अपने कर्तव्यों में ढिलाई बरतता है तो यह दण्डनीय होगा।
  • SC/ST अधिनियम के अंतर्गत किए गए किसी अपराध की जाँच, पुलिस उपाधीक्षक (DSP) से नीचे के स्तर का अधिकारी
    नहीं कर सकता।
  • कुछ विशिष्ट अपराधों के लिए अधिनियम में मृत्युदण्ड तथा संपत्ति जब्त करने का भी प्रावधान है। इस अधिनियम के अंतर्गत
    शामिल अपराधों के दोहराए जाने पर और अधिक कठोर दंड की भी व्यवस्था है। ‘

पीड़ित व्यक्ति तथा गवाहों के अधिकारों हेतु नया अध्याय जोड़ने, सरकारी कर्मचारियों के द्वारा ‘जानबूझकर की गई लापरवाही को परिभाषित करने तथा नए अपराधों जैसे जूतों की माला पहनाना आदि को जोड़ने हेतु अधिनियम को 2016 में संशोधित किया गया।

पृष्ठभूमि

अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत दर्ज की गयी एक शिकायत याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता का अनुभव किया तथा सुभाष महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य वाद में अत्याचार निवारण अधिनियम के सम्बन्ध में निम्नलिखित निर्देश ज़ारी किए:

  •  अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत दर्ज शिकायत में यदि प्रथम दृष्टया कोई मामला न बनता हो या न्यायिक
    संवीक्षा के उपरांत शिकायत प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होती हो तो ऐसी स्थिति में अग्रिम जमानत पूर्णतः प्रतिबंधित नहीं होगी।
  • अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रकरणों में गिरफ़्तारी के क़ानून के ज्ञात दुरुपयोग पाए जाने के कारण, अब किसी
    लोक सेवक की गिरफ़्तारी नियोक्ता अधिकारी की स्वीकृति (पूर्व स्वीकृति) के पश्चात तथा गैर-लोकसेवक की गिरफ़्तारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की अनुमति के पश्चात की जा सकती है। यह अनुमति आवश्यक समझे जाने वाले प्रकरणों में दी जा सकती है, और मजिस्ट्रेट के लिए हिरासत की अवधि बढ़ाये जाने हेतु ऐसे कारणों की संवीक्षा करना आवश्यक है।
  • झूठी संलिप्तता से किसी निर्दोष के बचाव के लिए पुलिस उपाधीक्षक द्वारा प्राथमिक जाँच की जा सकती है ताकि यह | सुनिश्चित किया जा सके कि वास्तव में लगाए गए आरोप अत्याचार निवारण अधिनियम के दायरे में आते भी हैं या नहीं
    और कहीं ये दुर्भावनापूर्ण या अभिप्रेरित तो नहीं हैं।
  • उपर्युक्त निर्देशों के किसी भी उल्लंघन के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी जो अनुशासनात्मक कार्रवाई से लेकर अवमानना के
    लिए दिए जाने वाले दंड तक कुछ भी हो सकती है।

तत्पश्चात, केंद्र ने अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दायर की गयी शिकायत पर सर्वोच्च न्यायालय के स्वतः गिरफ़्तारी
को रोकने संबंधी निर्णय के विरुद्ध अपील की, किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय को यथावत बनाए रखा।

स्वतः गिरफ़्तारी को रोकने संबंधी निर्णय के विरुद्ध अपील

निर्णय के पक्ष में तर्क

  • निर्दोष व्यक्तियों की सुरक्षा: यह निर्णय अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के अधिकारों में अवरोध
    उत्पन्न नहीं कर रहा है अपितु यह ऐसे निर्दोष व्यक्तियों की रक्षा करने पर केंद्रित है, जिन्हें झूठे मामले में फंसाया गया है।
  • मनमाने ढंग से गिरफ्तारी के विरुद्ध स्वतंत्रता: विलास पांडुरंग पवार और शकुंतला देवी मामलों में न्यायालय ने यह भी कहा कि अग्रिम जमानत पर रोक निरपेक्ष नहीं हैं, विशेष रूप से तब जबकि कोई मामला ही न बन रहा हो या आरोप स्पष्टतया झूठे या प्रेरित प्रतीत हो रहे हों। इसके पीछे यह तर्क निहित है कि मनमाने ढंग से गिरफ्तारी से स्वतंत्रता, विधि के शासन का एक मूलभूत अंग है।
  • अधिनियम का दुरुपयोग: NCRB के आंकड़े दर्शाते हैं कि अत्याचार (निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज 75% मामलों में आरोपित व्यक्ति निर्दोष साबित हुए हैं या मामले वापस ले लिये गए हैं। यह अधिनियम के दुरुपयोग को दर्शाता है।
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक, 2014 पर संसद की स्थायी समिति
    ने अत्याचार अधिनियम के तहत गिरफ्तारी के विरुद्ध सुरक्षा की आवश्यकता पर भी बल दिया था।

निर्णय के विपक्ष में तर्क

  • यह निर्णय वंचित एवं अत्यंत पिछड़े समुदाय को अधिकार प्रदान करने हेतु अधिनियमित कानून के क्रियान्वयन को कमजोर कर सकता है। साथ ही यह निर्णय SC-ST समुदाय के लिए उनके संवैधानिक अधिकारों, विशेषकर अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता उन्मूलन के अधिकार, से वंचित होने का कारण भी बन सकता है।
  • अतिरिक्त प्रक्रियात्मक आवश्यकताएं, 1989 के अधिनियम के सख्त प्रवर्तन को प्रभावित करेंगी। इस अधिनियम के तहत आने वाले मामलों के पंजीकरण में पहले से ही अनुचित देरी देखी जाती है; इस प्रकार यह निर्णय अधिनियमन की प्रभावकारिता को और कम कर सकता है।
  • शक्तियों का पृथक्करण: न्यायालय विधि के दायरे या विधायिका के मंतव्य का विस्तार नहीं कर सकता है, क्योंकि यह विधायिका की शक्तियों का अतिक्रमण होगा और परिणामस्वरूप न्यायिक अतिसक्रियता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
  • उन मामलों में दोषसिद्धि की दर निम्न हैं, जिनमें दबाव बनाया जाता है तथा इस दर के निम्न होने का एक अन्य कारण निम्नस्तरीय जांच और अभियोजन पक्ष की अक्षमता भी है, क्योंकि गवाह ऐसे मामलों में अपना बयान बदल देते हैं। साथ ही, समय के साथ झूठे मामले दर्ज होने में कमी आई है और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के मामलों में भी सुधार हुआ है।
  • NCRB के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले दस वर्षों (2007-2017) में दलितों के विरुद्ध अपराधों में 66% की वृद्धि हुई है। इस निर्णय का प्रतिकूल प्रभाव दलितों के विरुद्ध होने वाले अपराधों की निम्न रिपोर्टिंग के रूप में हो सकता है। इन अपराधों की रिपोर्टिंग पहले से ही काफी कम होती है।

निष्कर्ष

अनुसूचित जातियों / अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों तथा निर्दोष व्यक्तियों की सुरक्षा के मध्य संतुलन प्राप्त करने के लिए, अभियुक्तों के बचाव हेतु अधिनियम में एक अंतर्निहित प्रावधान हेतु संसदीय स्थायी समितियों की मांग पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही दोषसिद्धि की दरों के संबंध में चिंताओं को कम करने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में भी सुधार किये जाने चाहिए।

अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe)

महत्वपूर्ण तथ्य एवं आंकड़े

  • अनुसूचित जनजाति (ST) जनसंख्या भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बिखरे हुए विजातीय समूहों का प्रतिनिधित्व करती है। इन
    समूहों के अंदर भाषा, सांस्कृतिक प्रथाओं, सामाजिक-आर्थिक स्थितियों एवं आजीविका के विभिन्न तरीकों में अंतर व्याप्त है।
  • STS को जबरन प्रवासन, शोषण, औद्योगीकरण के कारण विस्थापन, ऋण दुष्चक्र और गरीबी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  • सामाजिक-आर्थिक विकास का स्तर जनजातीय और गैर जनजातीय जनसंख्या के मध्य, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र के मध्य, एक जनजाति से दूसरी जनजाति के मध्य और यहाँ तक कि जनजातीय समूह के विभिन्न उप-समूहों के मध्य भी परिवर्तित होता रहता है। इन असमानताओं और विविधताओं ने जनजातीय विकास को अत्यधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
  • निर्धनता: भारत में 52 प्रतिशत STS गरीबी रेखा (BPL) से नीचे निवास करते हैं एवं इनमें से 54 % ST आबादी की संचार एवं परिवहन जैसी आर्थिक परिसंपत्तियों तक पहुँच नहीं है (विश्व बैंक, 2011)।
  • साक्षरता दरः पूर्वोत्तर और द्वीपीय क्षेत्रों की जनजातियों में साक्षरता दर अपेक्षाकृत उच्च है परन्तु इसके बावजूद वहाँ पर
    ड्रॉपआउट दर और शिशु मृत्यु दर उच्च है।
  •  IMR एवं MMR: STS में ये दोनों ही दर उच्च हैं। हालाँकि, अन्य राज्यों की अपेक्षा ओडिसा के STs में बाल एवं शिशु मृत्यु
    दर अधिक है।
  • प्रवासन: भारत में STS को बड़े पैमाने पर विस्थापन तथा असंतोषजनक क्षतिपूर्ति एवं पुनर्वास समस्याओं का सामना करना पड़ता है। औद्योगीकरण तथा विकास परियोजनाओं के कारण पूर्वी क्षेत्र को विस्थापन की समस्याओं का अधिक सामना करना पड़ रहा है।
  • कृषि: कृषि पर निर्भरता, प्राकृतिक आपदा, फसल का नष्ट होना, भूमि तक कम पहुँच एवं रोजगार की कमी आदि मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में निर्धनता के प्रमुख कारण हैं।
  • बेरोजगारी: द्वीपीय क्षेत्रों के आदिवासियों में बेरोजगारी की दर अधिक है। वर्तमान समय में जनजातीय लोग ऐसी स्थिति में फंसे हुए हैं जहाँ प्राकृतिक संसाधनों पर वे अपने अधिकार खोते जा रहे हैं और जीवन-यापन के लिए नए पैटर्न के कामों और संसाधनों से सामंजस्य बिठाने में असमर्थ हैं। इनमें से अधिकांश लोग भूमिहीनता के परिणामस्वरुप दैनिक मजदूर या श्रमिक के रूप में कार्य करते हैं।
  • MFP पर निर्भरता: लघु वन उपज (MFP) वन क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासियों के लिए आजीविका का एक मुख्य साधन हैं। लगभग 100 मिलियन वन-वासी अपने भोजन, आश्रय, दवाइयों एवं नकदी आय के लिए MFP पर निर्भर हैं।

इसके अतिरिक्त, MFP से जुड़ा अधिकांश व्यापार प्रकृति में असंगठित है, जोकि सीमित मूल्य वर्धन और उच्च अपव्यय के
कारण अपने संग्राहकों को कम लाभ प्रदान करता है। अतः, MFP आपूर्ति श्रृंखला के बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंकजेज को मजबूत करने के लिए सुदृढ़ संस्थागत तंत्र के साथ एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

जनजातियों के लिए लघु वन उत्पादों का महत्वः

  • अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006, (The Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006) 15-UTETT À उत्पन्न होने वाले सभी गैर-काष्ठ वन उत्पादों को लघु वन उत्पादों (MFP) के रूप में परिभाषित करता है। इनके अंतर्गत बांस, झाड़ियाँ (ब्रशवुड), हूँठ (स्टंप), बेंत (canes), टसर (Tusser), कोकून (cocoon) , शहद, मोम, लाख, तेंदू / केंडू पत्तियां, औषधीय पौधे तथा जड़ी बूटी, जड़, कंद आदि सम्मिलित हैं।
  • जनजातियाँ अपनी वार्षिक आय का 20-40% MFP से प्राप्त करती हैं एवं इन गतिविधियों का महिलाओं के वित्तीय सशक्तिकरण से गहरा सम्बन्ध है क्योंकि अधिकाँश MFPs का संग्रहण और उपयोग/विक्रय महिलाओं द्वारा किया जाता है।
  • जनजातीय जनसंख्या के पारिश्रमिक की सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा “लघु वन उत्पाद (MFP) के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)” नामक योजना पहले से ही चलाई जा रही है।

अनुशंसाएँ:

  • अनुसूचित जनजातियों के बीच सकारात्मक बदलाव लाने के लिए क्षेत्र विशिष्ट दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर, द्वीपीय क्षेत्र की बेरोजगारी की समस्या को मत्स्यपालन एवं पर्यटन उद्योग को बड़े स्तर पर विकसित करके समाप्त किया जा सकता है।
  • जनजातीय समुदायों के लिए उपलब्ध विकास योजनाओं एवं कार्यक्रमों से लाभ प्राप्त करने के लिए जागरुकता बढ़ाने की आवश्यकता है। निम्न साक्षरता दर वाले राज्यों में शैक्षणिक विकास कार्यक्रमों एवं योजनाओं से सम्बंधित जानकारियां उपलब्ध कराने के लिए विशेष शिविरों का आयोजन किया जा सकता है।
  • झारखंड, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान जैसे कई राज्यों में अनुसूचित जनजातियों एवं PTGs के मध्य भुखमरी से होने वाली मृत्युओं को रोकने के लिए, इन्हें श्रम बाजार की जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है।
  • ऋण एवं बैंकिंग क्षमताओं तक सहज पहुंच होनी चाहिए, जिससे ये जनजातियां लाभान्वित हो सकें।
  • जनजातियों को वन उत्पादों तक पहुंच प्रदान करना एवं लाभ को सकारात्मक दिशा प्रदान करना।

भारत सरकार द्वारा हाल ही में की गयी नई पहल – वन धन योजना

  • इस योजना के अंतर्गत 30 जनजातीय संग्राहकों वाले 10 स्वयं सहायता समूहों (वन धन विकास समूहों) का निर्माण किया जाएगा। तत्पश्चात इन समूहों को जंगल से इकट्ठा किए गए उत्पादों के मूल्य वर्धन हेतु कार्यशील पूंजी उपलब्ध करवायी जाएगी।
  • वन धन विकास केंद्र एक बहुउद्देश्यीय प्रतिष्ठान है, जिसके द्वारा कौशल उन्नयन, क्षमता निर्माण प्रशिक्षण तथा प्राथमिक प्रसंस्करण एवं मूल्यवर्धन की सुविधा प्रदान की जाएगी।

विमुक्त, घुमन्तू / अर्द्ध घुमन्तू जनजाति (Denotified, Nomadic & Semi-Nomadic Tribes)

राष्ट्रीय विमुक्त/ घुमन्तू/ अर्द्ध घुमन्तू जनजाति आयोग (NCDNT) ने अपनी रिपोर्ट, “वॉइसेज ऑफ़ द डीनोटीफाइड, नोमेडिक एंड सेमी-नोमेडिक ट्राइब्स” प्रस्तुत की।

पृष्ठभूमि

भारत सरकार द्वारा विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध -घुमंतू जनजातियों के लिये एक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया है। इसे निम्नलिखित कार्यों हेतु अधिदेशित किया गया है:

  • इन जनजातियों को अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित किए जाने की प्रगति का
    मूल्यांकन करना,
  • उनके सघन निवास क्षेत्रों की पहचान करना,
  • उनके विकास की प्रगति की समीक्षा करने एवं उनके उत्थान के उचित उपाय सुझाना, तथा
  • DNT/NT की पहचान करना और इनकी राज्य-वार लिस्ट निर्मित करना।

विमुक्त जनजातियां (denotified tribes) कौन सी हैं?

  •  वे लोग जिन्हें ब्रिटिश शासन के दौरान अपराधी जनजातियों के रूप में अधिसूचित किया गया था तथा स्वतंत्रता के उपरांत
    1949-50 की अनंतशयनम अय्यंगर की रिपोर्ट के आधार पर 1952 में विअधिसूचित कर दिया गया, विमुक्त जनजातियों के
    रूप में जाने जाते रहे हैं। इसके साथ ही ऐसी कई घुमंतू जनजातियाँ भी हैं जो इन DNT समुदायों का भाग थीं।
  • “ये समुदाय सर्वाधिक उत्पीड़ित थे” तथापि जातिगत आधार पर इन्हें सामाजिक अस्पृश्यता का सामना नहीं करना पड़ा।

इन जनजातियों के समक्ष समस्याएं:

  • इन समुदायों के लोग अभी भी रूढिवादी बने हुए हैं। इनमें से अधिकांश को भूतपूर्व-अपराधी जनजाति की संज्ञा दी गई है।
  • ये लोग अलगाव तथा आर्थिक कठिनाइयों का भी सामना करते हैं। इनके अधिकांश पारंपरिक व्यवसायों जैसे साँप का खेल,
    सड़क पर कलाबाजी करने तथा मदारी का खेल दिखाने इत्यादि को अपराधिक गतिविधि के तौर पर अधिसूचित कर दिया गया है। इससे इनके लिए अपनी आजीविका अर्जित करना और भी कठिन हो गया है।
  • अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत भी कई विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां हैं, किंतु इन्हें कहीं भी वर्गीकृत नहीं किया गया है। साथ ही, विभिन्न सामाजिक-आर्थिक लाभों जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास या ऐसी ही अन्य सुविधाओं तक इनकी पहुँच नहीं है।
  • इन समूहों की शिकायतों में भोजन, पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, निम्न स्तरीय बुनियादी ढांचा इत्यादि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, इनमें से अनेक लोग जाति प्रमाण पत्र न प्राप्त होने, राशन कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, आधार कार्ड आदि न होने की भी शिकायत करते हैं।
  • विभिन्न राज्यों के बीच इन समुदायों की पहचान करने को लेकर कई विसंगतियां विद्यमान हैं। इन जनजातियों एवं इनकी
    शिकायतों का समाधान करने वाले प्राधिकरण के विषय में जागरूकता का अभाव है।
  • इन सभी समस्याओं के परिणामस्वरूप कई समुदाय जनसंख्या में गिरावट की समस्या से जूझ रहे हैं।

रिपोर्ट की सिफारिशें

  • चूंकि इन जनजातियों/ समुदायों से संबंधित जनगणना के मूल आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, अतः किसी प्रतिष्ठित सामाजिक विज्ञान
    संस्थान के माध्यम से इनका सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण करवाए जाने की आवश्यकता है।
  • केंद्र को इसमें से DNT-SC, DNT-ST एवं DNT-OBC जैसी अलग श्रेणियां बना देनी चाहिए, जिनके लिए अलग से एक उप-कोटा निर्धारित हो। जहाँ अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों का उप-श्रेणीकरण जटिल सिद्ध हो सकता है, वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर यह कार्य तुरंत किया जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि केंद्र द्वारा पहले ही जस्टिस रोहिणी कुमार की अध्यक्षता में एक आयोग की स्थापना कर दी गई है जो सदस्य समुदायों के विकास की स्थिति के अनुसार केंद्र की OBC सूची को उप-विभाजित करेगा
  • एक स्थायी आयोग का गठन इस उद्देश्य से किया जा सकता है कि वह नियमित आधार पर स्वतंत्र रूप से इन समुदायों ।
    जनजातियों का ध्यान रख सके।
  • विमुक्त जनजातियों को “कलंकमुक्त करने के उद्देश्य से पैनल ने अनुशंसा की है कि केंद्र 1952 के हैबिचुअल ऑफेंडर एक्ट को
    निरस्त कर दे।

हैबिचुअल ऑफेंडर एक्ट, 1952

इसमें अपराधी जनजातियों पर अपराधी होने का लांछन लगाने की बजाए उनकी निकृष्ट दशाओं को सुधारने के लिए उपयुक्त कदम उठाने की अनुशंसा की गई थी। इसके परिणामस्वरूप 1871 के अपराधी जनजातियाँ अधिनियम को निरस्त कर उसके स्थान पर 1952 में हैबिचुअल ऑफेंडर एक्ट लाया गया।

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