भारत द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए गए कदम

जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (National Action Plan on Climate Change (NAPCC)

भारत सरकार द्वारा विशिष्ट क्षेत्रों के लिए जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत आठ मिशन प्रारंभ किए गए हैं, जिनमें जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का आकलन तथा जलवायु परिवर्तन के समाधान हेतु आवश्यक कार्यवाही को शामिल किया गया  है

राष्ट्रीय सौर मिशन: NAPCC का लक्ष्य विद्युत उत्पादन के लिए सौर ऊर्जा के विकास और उपयोग को बढ़ावा देना है तथा इसका
अंतिम उद्देश्य जीवाश्म आधारित ऊर्जा विकल्पों के साथ सौर ऊर्जा को प्रतिस्पर्धी बनाना है।

राष्ट्रीय विस्तारित ऊर्जा दक्षता मिशन (NMEEE): NMEEE के अंतर्गत ऊर्जा गहन उद्योगों के लिए ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने हेतु चार पहलें सम्मिलित की गयी हैं जो निम्नानुसार हैं:

  • PAT (प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार) योजना: ऊर्जा गहन क्षेत्र में दक्षता में सुधार करना।
  • ऊर्जा दक्षता वित्तपोषण मंच (EEFP): यह ऊर्जा दक्षता परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए वित्तीय संस्थाओं और
    परियोजना के विकासकर्ताओं के साथ परस्पर वार्ता करने हेतु एक मंच प्रदान करता है।
  • ऊर्जा कुशल आर्थिक विकास प्रारूप (FEEED): यह मुख्यतः ऊर्जा दक्षता वित्तपोषण को बढ़ावा देने के लिए उचित
    राजकोषीय उपकरणों के विकास पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • ऊर्जा दक्षता के लिए बाज़ार का रूपांतरण (MTEE): ऊर्जा दक्ष उपकरणों को बढ़ावा देना।

धारणीय आवास के लिए राष्ट्रीय मिशन: नगर नियोजन के मूल घटक के रूप में ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने के लिए इस मिशन के अंतर्गत निम्नलिखित घटक शामिल हैं:

  • मौजूदा ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ECBC) का विस्तार करना;
  • शहरी अपशिष्ट प्रबंधन और पुनर्चक्रण पर अधिक बल देना जिसमें अपशिष्ट से विद्युत् उत्पादन करना भी शामिल है;
  • ऑटोमोटिव फ्यूल इकॉनोमिक स्टैंडर्स के प्रवर्तन का सुदृढीकरण और ऊर्जा दक्ष वाहनों की खरीद को प्रोत्साहित करने हेतु
    मूल्य निर्धारण उपायों का प्रयोग करना; तथा
  • सार्वजनिक परिवहन के उपयोग के लिए प्रोत्साहन प्रदान करना।

राष्ट्रीय जल मिशन: जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप भविष्य में जल की अत्यधिक कमी होने की संभावना है। इसे ध्यान में
रखते हुए इस मिशन के अंतर्गत मूल्य निर्धारण और अन्य उपायों के माध्यम से जल उपयोग दक्षता में 20% सुधार का लक्ष्य
निर्धारित किया गया है।

हिमालयी पारिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन: इस मिशन का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में जैव-विविधता, वनावरण
और अन्य पारिस्थितिकी मूल्यों को संरक्षित करना है। अनुमान है कि वैश्विक तापन के परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में स्थित हिमनदों
(जो भारत की जल आपूर्ति के प्रमुख स्रोत हैं) के आकार में कमी आएगी।

‘हरित भारत’ राष्ट्रीय मिशन: इस मिशन के अंतर्गत 6 मिलियन हेक्टेयर निम्नीकृत वनीय भूमि पर वनीकरण और भारतीय क्षेत्र पर
वनावरण को 23% से बढ़ाकर 33% तक करना है।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन: इस मिशन का उद्देश्य जलवायु-प्रत्यास्थ फसलों, मौसम आधारित बीमा तंत्र का विस्तार और कृषि
कार्यप्रणालियों के विकास के माध्यम से कृषि में जलवायु अनुकूलन के विकास को बढ़ावा देना है। जलवायु परिवर्तन पर रणनीतिक ज्ञान के लिए राष्ट्रीय मिशन: जलवायु विज्ञान, प्रभाव और चुनौतियों के संबंध में बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए इस मिशन के अंतर्गत एक नए जलवायु विज्ञान शोध कोष, बेहतर जलवायु प्रतिरूपण तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने की परिकल्पना की गई है। यह वेंचर कैपिटल फंड्स के माध्यम से अनुकूलन और शमन प्रौद्योगिकियों को विकसित करने के लिए निजी क्षेत्र की पहलों को भी प्रोत्साहित करता है।

NAPCC का महत्व

  • इसने सरकार के नीतिगत एजेंडे में शमन और अनुकूलन उपायों को शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • नवाचारी बाजार-आधारित तंत्र और नीतियों को आरंभ करना जैसे PAT योजना, सोलर रूफटॉप इन्वेस्टमेंट प्रोग्राम इत्यादि।
  • जल संसाधन सूचना प्रणाली (WRIS) की भांति सार्वजनिक डोमेन में डेटाबेस की स्थापना।
  • राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर संस्थानों और साझेदारी का विकास करना उदाहरणार्थ -भारत के नेतृत्व वाला अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन।

मिशन विशिष्ट सफलताएं:

  • राष्ट्रीय सौर मिशन – सौर प्रशुल्क ग्रिड सम्बन्धी प्रशुल्कों के स्तर पर आ गए हैं। इस सन्दर्भ में कई पहले प्रारंभ की गई हैं जैसे
    अल्ट्रा मेगा सौर ऊर्जा परियोजनाएं, हरित ऊर्जा गलियारा इत्यादि।
  • धारणीय आवास पर राष्ट्रीय मिशन – इसने संधारणीय नगरीकरण को बढ़ावा दिया है तथा इससे संबंधित विभिन्न पहलों में
    शामिल हैं-ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता, अमृत मिशन, स्मार्ट सिटीज आदि।

NAPCC से संबंधित मुद्दे

  • संरचनात्मक कमियां- यह स्वतंत्र योजनाओं का एक समुच्चय है, जिनमें एक एकीकृत दृष्टिकोण का अभाव है। इसके अंतर्गत मिशन उद्देश्यों के साथ AMRUT जैसी वर्तमान योजनाओं को संरेखित किया गया है, परन्तु इनके समन्वय के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया है।
  • प्रदर्शन संबंधी मुद्देः कुछ मिशन अत्यंत विस्तृत हैं। इनकी कार्य अवधि लंबी (जैसे हरित भारत मिशन) है तथा इनमें मापन योग्य लक्ष्यों का अभाव है। इसके परिणामस्वरूप इन मिशनों की प्रगति बाधित होती है।
  • विशेषज्ञता की कमी: निम्न R&D, कुशल जनशक्ति और विशेषज्ञता की कमी ने NMSKCC, NMSA, NMSHE जैसे मिशनों की प्रगति को मंद कर दिया है।
  • कुशल कार्यात्मक विकेन्द्रीकरण की कमी जो राज्य/स्थानीय स्तर पर निम्न क्षमता निर्माण के कारण और भी बढ़ गयी है।
  • बाजार-आधारित निवेश की कमी सीमित बजटीय संसाधनों पर पूर्ण निर्भरता को बढ़ावा देती है।
  • अप्रभावी निगरानी तंत्र: जलवायु परिवर्तन की प्रगति के संबंध में प्रधानमंत्री की जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी परिषद को सूचित किया जाना चाहिए किन्तु इस परिषद् के पुनर्गठन के पश्चात् अभी तक इसकी केवल एक ही बैठक हुई है।
  • अन्य बाधाएं – परियोजना स्वीकृति में विलंब, विवादित नीतिगत मुद्दे (जैसे विद्युत खरीद समझौतों संबंधी पुनर्वार्ता में विलंब)।

PAT योजना (PAT Scheme)

PAT (परफॉर्म,अचीव एंड ट्रेड) योजना के बारे में

  • इस योजना को ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (ऊर्जा मंत्रालय) द्वारा नेशनल मिशन फॉर एन्हांस्ड एनर्जी एफिशिएंसी (NMEEE) के तहत शुरू
    किया गया था।
  • यह बाजार आधारित तंत्र है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के लिए दक्षता लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। जिन उद्योगों द्वारा निर्धारित लक्ष्य से अधिक प्राप्त किया जाएगा उन्हें ऊर्जा बचत प्रमाण पत्र (ESCert) के रूप में प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
  • ये प्रमाणपत्र दो एनर्जी एक्सचेंज क्रमशः इंडियन एनर्जी एक्सचेंज और पावर एक्सचेंज इंडिया में विपणन योग्य होंगे। जहाँ इन्हें उन उद्योगों द्वारा खरीदा जा सकता है जो अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं।
  • PAT साइकल-I (2012-13 से 2014-15) को 8 ऊर्जा गहन क्षेत्रों पर लागू किया गया था। इन 8 क्षेत्रों में करीब 478 नामित उपभोक्ता (Designated Consumers) हैं जो प्रतिवर्ष 165 मिलियन टन तेल के बराबर ऊर्जा का उपभोग करते हैं (भारत की प्राथमिक ऊर्जा खपत का 33%)।
  • PAT साइकल-II (2016 से 2018-19): इसमें PAT-I के 8 क्षेत्र और 3 नए क्षेत्र क्रमशः रेलवे, डिस्कॉम और पेट्रोलियम रिफाइनरीज शामिल हैं।
  • PAT साइकल-III (2017 से 20): इसके अंतर्गत 116 नई इकाइयों को शामिल किया गया है तथा इन्हें 1.06 मिलियन टन तेल के
    बराबर उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य दिया गया है।

योजना के निष्कर्ष

  • इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में ऊर्जा-गहन उद्योगों ने अपने कार्बन उत्सर्जन को 31 मिलियन टन (भारत के कुल वार्षिक उत्सर्जन
    का 2 प्रतिशत) तक कम किया है तथा इस प्रकार 2012-2015 के बीच तीन वर्षों में कुशल ऊर्जा के उपयोग के माध्यम से 9,500 करोड़ रुपये से अधिक की बचत की है।
  • यह तथ्य भारतीय उद्योगों के क्रमिक रूप से निम्न उत्सर्जन करने वाले उद्योग बनने की ओर संकेत करता है। यह इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि 5,635 मेगावाट बिजली का उत्पादन नहीं करना पड़ा जिससे 37,685 करोड़ रुपये की मौद्रिक बचत हुई।

पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environment Impact Assessment)

सरकार ने पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 में संशोधन के लिए एक मसौदा अधिसूचना जारी की है।

प्रस्तावित संशोधनों की मुख्य विशेषताएँ :

  • ये संशोधन विशेषत: गैर-कोयला खनिजों तथा लघु खनिजों से संबंधित खनन परियोजनाओं तथा साथ ही नदी घाटी/सिंचाई परियोजनाओं को पर्यावरणीय अनुमति (ECs) प्रदान करने के लिए राज्य सरकार के प्राधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में वृद्धि करते हैं।
  • केन्द्रीय प्राधिकरण 50 या उससे अधिक हेक्टेयर भूमि पट्टे के प्रारम्भिक मानदंड के स्थान पर गैर-कोयला परियोजनाओं के लिए 100 हेक्टेयर या उससे अधिक भूमि पट्टे की अनुमति प्रदान करेगा।
  • विशेष परिस्थितियों जैसे एक से अधिक राज्यों को समाहित करने वाली नदी घाटी परियोजनाओं के लिए केंद्र सरकार ही मूल्यांकन प्राधिकारी होगी।
  • पर्यावरणीय अनुमति (EC) में रियायत: पर्यावरण के लिए लाभकारी सिंचाई प्रौद्योगिकियों में परिवर्तन से सम्बंधित उन परियोजनाओं के लिए अब EC की आवश्यकता नहीं होगी जिनसे CCA में तो वृद्धि हो परन्तु बाँध की ऊँचाई या जलमग्नता
    (submergence) में कोई वृद्धि न हो।

पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) क्या है?

  • यह प्रस्तावित परियोजना अथवा विकास के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन करने की एक प्रक्रिया है, जिसमें अंतर
    संबंधित सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और मानव-स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों (सकारात्मक और नकारात्मक दोनों) का मूल्यांकन किया जाता है।
  • इसका उद्देश्य परियोजना नियोजन और डिजाइन के प्रारंभिक चरण में पर्यावरणीय प्रभावों का पूर्वानुमान लगाना, प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के उपायों और साधनों को खोजना, स्थानीय पर्यावरण के अनुरूप परियोजनाओं को आकार प्रदान करना और निर्णय निर्माताओं के समक्ष पूर्वानुमानों और विकल्पों को प्रस्तुत करना है।
  • इसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत अधिसूचित किया गया है। इसका उपयोग पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पर्यावरण पर तीव्र औद्योगिकीकरण के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने और उन प्रवृत्तियों में परिवर्तन करने के लिए एक प्रमुख उपकरण के रूप में | किया जाता है जो दीर्घकाल में जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा दे सकती हैं।

रणनीतिक पर्यावरण आकलन

  • यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा योजनाओं और कार्यक्रमों की तैयारियों और उनको अंतिम रूप में स्वीकृति प्रदान करने से पूर्व
    पर्यावरणीय विचारों को पूर्ण रूप से एकीकृत किया जाना आवश्यक है।
  • निर्णयन के उच्च स्तर पर राज्य पर्यावरण एजेंसी, पर्यावरणीय विचारों को एकीकृत करने हेतु एक सक्रिय दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व
    करती है।

EIA के लिए प्रक्रिया (इन्फोग्राफिक)

सीमाएँ:

  • विशेषज्ञता का अभाव: इन एजेंसियों के पास न तो अतिरिक्त कार्यभार संचालन की क्षमता है। और न ही पारदर्शिता सुनिश्चित करने की कोई उत्तरदायित्व प्रणाली है।
  • हित संघर्ष: प्रायः यह देखा गया है कि अधिकांश EIA प्रक्रिया, उन एजेंसियों द्वारा वित्तपोषित होती हैं जिनका हित शीघ्रता से EC प्राप्त करने में होता है। इससे EIA की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है।
  • कोई प्रमाणन नहीं: EIA का प्रवर्तन करने वाले विशेषज्ञ निजी लाभ के लिए आंकड़ों में हेर-फेर कर सकते हैं जिसके परिणामस्वरूप EIA में धोखाधड़ी हो सकती है।
  • सहभागिता: प्रारम्भिक चरणों में सार्वजनिक और सरकारी एजेंसियों की सीमित भागीदारी, लोगों के मध्य EIA की स्वीकार्यता को बाधित करती है।
  • अधिकांश मामलों में पर्यावरण पर निम्नतर प्रभाव डालने वाले परियोजना विकल्पों का सुझाव ही नहीं दिया जाता है।
  • स्थानीय ज्ञान: अधिकांश EIA प्रतिवेदनों में स्थानीय ज्ञान या स्थानीय इनपुट (input) पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, अधिकतर प्रतिवेदनों का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद भी नहीं किया जाता है।
  • व्यापक आंकड़ों का अभाव: आंकड़ा संग्रहण की प्रक्रिया वर्ष के एक सत्र तक ही सीमित होती है और उस आधार पर EIA का निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण होगा।
  • राज्य प्राधिकरणों के मध्य शक्तियों का विकेंद्रीकरण भ्रष्ट व्यवहार का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिए केन्द्रीय स्तर पर
    समीक्षा से बचने के लिए, परियोजना डेवेलपर्स वृहद परियोजनाओं को अलग-अलग चरणों में विभाजित कर सकते हैं।

आगे की राह

  • स्वतंत्र निगरानी प्राधिकरण: EIA की विश्वनीयता की जाँच के लिए केन्द्रीय स्तर पर ऐसे प्राधिकरण का गठन किया जाना चाहिए।
  • सरलीकरण: EIA में तकनीकी विवरण और विभिन्न खंडों में अधिक पारदर्शिता, जैसे परियोजना के प्रतिकूल प्रभाव की परिभाषा को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
  • पूर्व सूचित सहमति: EC प्रदान करते समय, ग्रामीण, शहरी स्थानीय निकायों तथा पंचायत निकायों जैसे स्थानीय हितधारकों की
    पूर्व सूचित सहमति को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
  • सुदृढ़ क्रियाविधि: जैसे- शिकायत निवारण प्रणाली, सलाहकारी विशेषज्ञ समिति और सभी हितधारकों से सम्बंधित क्षमता निर्माण
    दृष्टिकोण वर्तमान समय की आवश्यकता है।

 भारत में हरित वित्त व्यवस्था (Green Finance Ecosystem in India)

देश में हरित वित्त व्यवस्था की स्थापना के लिए विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा दबाव बनाया गया।

हरित वित्त क्या है?

हरित वित्त एक व्यापक शब्द है जो संधारणीय विकास संबंधी परियोजनाओं और पहलों, पर्यावरणीय उत्पादों में वित्तीय निवेश तथा अधिक संधारणीय अर्थव्यवस्था के विकास को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों को संदर्भित करता है।

हरित वित्त की आवश्यकता:

  • UNEP के अनुसार, वर्ष 2030 तक विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन की लागत 140 बिलियन अमेरिकी
    डॉलर से बढ़कर 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष हो जाएगी।
  • भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है। हमारे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अभीष्ट योगदान (INDC) की प्राप्ति हेतु
    हरित वित्त की आवश्यकता है।
  • 2040 तक देश को अवसंरचना संबंधी वित्तपोषण के लिए 4.5 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता होगी। 2022 तक 175 GW नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन हेतु लगभग 200 अरब डॉलर, इलेक्ट्रिक वाहन कार्यक्रम के लिए 667 बिलियन डॉलर और वहनीय हरित आवासों के लिए लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता होगी।

प्रमुख वैश्विक पहल:

 हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund: GCF) 

  • यह जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने हेतु विकासशील देशों द्वारा किये जा रहे प्रयासों को सहायता प्रदान करने के लिए निर्मित एक वैश्विक निधि है।
  • यह 194 देशों द्वारा स्थापित की गयी थी। जो 2010 में संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के पक्षकार
    थे और जो कन्वेंशन के वित्तीय तंत्र के भाग के रूप में सम्मिलित थे।
  • इसका उद्देश्य शमन और अनुकूलन के लिए समान वित्तपोषण प्रदान करना है।
  • इस निधि में योगदान मुख्य रूप से विकसित देशों और कुछ विकासशील देशों, क्षेत्रों और एक शहर (पेरिस) द्वारा किया जाता हैं।

वैश्विक पर्यावरण सुविधा (Global Environment Facility: GEF)

  • इसका गठन 1992 के रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन के दौरान किया गया था। इसका उपयोग पृथ्वी पर पड़ने वाली सर्वाधिक पर्यावरणीय समस्याओं के दबावों से निपटने में सहायता हेतु किया जाता है।
  • CBD, UNFCCC, UNCCD, स्टॉकहोम अभिसमय और मिनामाटा अभिसमय जैसे अभिसमयों के लिए GEF वित्तीय तंत्र के
    रूप में भी कार्य करता है।

क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म (CDM)

यह क्योटो प्रोटोकॉल के तहत शमन उपकरणों में से एक है। CDM विकासशील देशों में CER (उत्सर्जन में प्रमाणित कमी) क्रेडिट प्राप्त करने हेतु निम्न उत्सर्जन वाली परियोजनाओं को अनुमति प्रदान करता है। एक क्रेडिट एक टन CO2 के बराबर होता है। इनकी बिक्री और व्यापार किया जा सकता है और क्योटो प्रोटोकॉल के तहत उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य के एक भाग को पूरा करने के लिए औद्योगिक देशों द्वारा इसका उपयोग किया जा सकता है।

भारत में वर्तमान परिदृश्य

  • भारत में बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFC) हरित अवसंरचना के लिए वित्तपोषण के प्राथमिक स्रोत हैं।
  • भारत द्वारा नाबार्ड के तहत जलवायु परिवर्तन के लिए समर्पित, जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय अनुकूलन कोष (NAFCCNational Adaptation Fund for Climate Change) का भी कार्यान्वयन किया जा रहा है।
  • 2015 में भारत का प्रथम हरित बांड जारी किया गया था। भारत द्वारा हरित बांड के माध्यम से 6 बिलियन डॉलर से अधिक पूंजी का संग्रह किया गया है, जिसका एक तिहाई 2017 में जारी किया गया था। (2017 में 120 बिलियन डॉलर के वैश्विक बाजार में 22% भागीदारी के साथ चीन शीर्ष हरित बॉन्ड जारीकर्ता देश था, इसके बाद अमेरिका (13%) का स्थान था)।
  • हाल ही में GIFT सिटी के इंडिया INX द्वारा ग्लोबल सिक्यूरिटी मार्किट (GSM) पर भारतीय रेलवे वित्त निगम (IRFC) के प्रथम हरित बांड को सूचीबद्ध किया गया है। BSE द्वारा BSE ग्रीनेक्स नामक एक हरित सूचकांक की भी शुरुआत की गयी है।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना के वित्त पोषण को प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र की ऋण श्रेणी के रूप में
    सम्मिलित किया गया है।
  • भारत के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन द्वारा जलवायु परिवर्तन के शमन की रणनीति के रूप में 2030 तक 1,000 GW की
    सौर क्षमताओं के वित्तपोषण और परिनियोजन के लिए 1 ट्रिलियन डॉलर पूंजी संग्रह का लक्ष्य रखा गया है।

भारत में चुनौतियां

  • बैंकों में परिसंपत्ति-देयता असंगतिः उच्च गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के कारण भारतीय बैंकों के पास दीर्घकालिक ऋण
    प्रदान करने के सीमित अवसर उपलब्ध हैं।
  • हरित परियोजनाओं की जेस्टेशन अवधि अधिक होती है तथा क्षमता संबंधी अवरोध भी विद्यमान हैं।
  • विकासशील देशों में विकसित ग्रीन फाइनेंस ट्रेड मार्केट का अभाव। इसके अतिरिक्त, हरित वित्तपोषण के कार्यान्वयन के लिए परियोजनाओं की पर्यावरणीय व्यवहार्यता की जांच हेतु वित्तीय संस्थानों की आवश्यकता होती है जो महंगी और अरुचिकर हो सकती हैं।
  • वर्तमान विनियामकीय प्रतिबंध, बीमा कंपनियों और पेंशन फंडों को केवल AAA रेटिंग वाले बॉन्ड में निवेश की अनुमति प्रदान करता है।
  • हरित वित्त वर्तमान में नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश पर केंद्रित है और स्थापित क्षमता के लगभग 60% कोयला आधारित विद्युत् के योगदान के बावजूद हरित कोयला प्रौद्योगिकी पर कम बल दिया जा रहा है।
  • अत्यधिक लेखांकन को रोकने के लिए हरित वित्तपोषण की अंतरराष्ट्रीय रूप से स्वीकृत एक परिभाषा होनी चाहिए।
  • अभी भी निजी हरित वित्त का अभाव है।
  • GST के अंतर्गत पर्यावरण से संबंधित तीन उपकरों को समाहित किया गया: स्वच्छ भारत उपकर और स्वच्छ ऊर्जा उपकर तथा जल उपकर स्वच्छ ऊर्जा के वित्तपोषण में सहायक है।
  • अस्पष्ट सरकारी नीति: अभी तक हरित वित्तपोषण पर वित्तीय संस्थानों को मार्गदर्शन और प्रोत्साहन प्रदान करने वाली किसी स्पष्ट नीति का अभाव है। इसके अतिरिक्त, कार्यान्वयन की भी एक समस्या है। नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश करने वाले निवेशकों का केवल 10% ही सरकारी सब्सिडी प्राप्त कर पाता है।

भारत के लिए सुझाव

  • निम्न स्तरीय रेटिंग वाले बॉन्ड में भी निवेश की अनुमति प्रदान करने के लिए नियामक ढांचे को सुगम बनाया जाना चाहिए।
  • सरकार को हरित बांड को कर मुक्त किये जाने पर विचार करना चाहिए।
  • स्मार्ट सिटीज परियोजना इन बॉन्डों से व्यापक पूंजी आकर्षित कर सकता है।
  • GIC, अबू धाबी निवेश प्राधिकरण जैसे सॉवरेन फण्ड और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, अंतर्राष्ट्रीय वित्त कार्पोरेशन और एशियाई विकास बैंक जैसी बहुपक्षीय एजेंसियां हरित संधारणीय परियोजनाओं में निवेश के लिए सक्रिय रूप से निधि को चैनलीकृत कर रही हैं।
  • हमें “हरित परियोजनाओं” को केवल सौर या पवन ऊर्जा तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए बल्कि इसे संधारणीय भूमि उपयोग, जल एवं शहरी अपशिष्ट प्रबंधन, हरित भवनों, स्वच्छ परिवहन, प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण प्रणाली और ऊर्जा दक्षता परियोजनाओं आदि तक भी विस्तृत करना चाहिए।
  • पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने वाली CSR गतिविधियों का संचालन करने वाली कंपनियों को ऋण आवंटन में प्राथमिकता प्रदान की जा सकती है। हरित आवेदनों और ऋणों के अनुमोदनों की जाँच करने हेतु एक अनिवार्य प्रमाणीकरण निकाय की स्थापना की जा सकती है।
  • गैर सरकारी संगठनों को संगठित किया जा सकता है और सामान्य ग्राहकों को संवेदनशील बनाने और बैंकों को हरित वित्त के लिए प्रोत्साहित करने (nudge effect) हेतु प्रेरित किया जा सकता है।
  • सोलर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट जैसे नवाचार जो कई लघु-स्तरीय परियोजनाओं को इक्विटी फंडिंग प्रदान करते हैं और सस्टेनेबल एनर्जी बांड  जो NBFC के माध्यम से प्रभावी निवेशकों से वित्त का संचालन करता है, वह बाजार को बढ़ावा दे सकता है।
  • आर्थिक संवृद्धि और सामाजिक विकास को संतुलित करने के साथ-साथ वाणिज्यिक ऋण निर्णयों में पर्यावरणीय प्रभाव को
    सम्मिलित करने के लिए हरित वित्त को मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता है।

 ग्रीन स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम (Green Skill Development Programme)

सरकार, ग्रीन स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम (GSDP) को अखिल भारतीय स्तर पर विस्तृत करने की योजना बना रही है।

अन्य संबंधित तथ्य

  • ENVIS हब्स/RPs के विशाल नेटवर्क व विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने पर्यावरण एवं वन क्षेत्र में दक्षता विकास की एक पहल आरंभ की है। इस पहल का उद्देश्य भारतीय युवाओं को लाभप्रद रोजगार/ अथवा स्व-रोजगार प्राप्त करने हेतु सक्षम बनाना है। इस पहल को ग्रीन स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम (GSDP) से जाना जाता है।

2017 के एक पायलट प्रोजेक्ट के पश्चात्, मंत्रालय ने इसका विस्तार करने के लिए अब निम्नलिखित कदम उठाए हैं:

  • 2018-19 के बजट में ENVIS के लिए बजट आवंटन 33% बढ़ा दिया गया है। इसमें से GSDP के अंतर्गत दिए जाने वाले
    प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का वित्तपोषण किया जाएगा।
  • लक्ष्य में वृद्धिः कुल 5 लाख 60 हजार लोगों को 2018-19 तथा 2020-21 के बीच प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।
  • अपेक्षाकृत अधिक ग्रीन स्किल्स: सरकार ने प्रदूषण निगरानी (वायु/जल/ध्वनि/मृदा), अपशिष्ट उपचार संयंत्र कार्य, वन प्रबंधन,
    जल बजटन आदि सहित 35 प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को चिह्नित किया है।

ग्रीन स्किल्स:

  • ग्रीन स्किल्स वे दक्षताएं हैं जो उत्पादों, सेवाओं व प्रक्रियाओं के जलवायु परिवर्तन एवं संबंधित पर्यावरणीय आवश्यकताओं व विनियमों के अनुसार अनुकूलन हेतु आवश्यक हैं। इनमें सतत् एवं संसाधन कुशल समाज (OECD की परिभाषानुसार) में रहने, उसके विकास व समर्थन के लिए आवश्यक ज्ञान, योग्यताएं, मूल्य और दृष्टिकोण सम्मिलित हैं।
  • ये दक्षताएं नवीकरणीय उर्जा, अपशिष्ट जल उपचार, जलवायु सहिष्णु शहर, ग्रीन निर्माण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि क्षेत्रों के लिए आवश्यक हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है?

  • अकुशल को कुशल बनाना: 2022 तक भारत को विभिन्न क्षेत्रों में लगभग 10.4 करोड़ नए कर्मकारों की आवश्यकता होगी और | इसलिए कौशल विकास इस माँग को पूरा कर पाने की एक पूर्वशर्त है।
  • इस कार्यक्रम के प्रशिक्षुओं को वन्यजीव संरक्षण, नर्सरियों, बागवानी आदि की विशेषज्ञता भी प्रदान की जा सकती है तथा उन्हें
    राज्य सरकारों के पर्यावरण एवं वन विभाग द्वारा भी नियोजित किया जा सकता है।
  • निष्पक्षता पर ध्यान: यह कार्यक्रम उन युवाओं के प्रशिक्षण का उद्देश्य रखता है जो विभिन्न वित्तीय अथवा सामाजिक बाधाओं के
    कारण अपनी उच्च शिक्षा जारी रख पाने में अक्षम हैं किंतु उनके भीतर नई चीजें सीखने व कुछ सार्थक करने की ललक मौजूद है।
  • तकनीकी ज्ञान एवं सतत विकास के लिए प्रतिबद्धता वाला ग्रीन स्किल्ड कार्यबल SDGs, INDCs तथा राष्ट्रीय जैव-विविधता
    लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक होगा।
  • ग्रीन स्किल, ऊर्जा व उत्सर्जन गहन अर्थव्यवस्था से उत्पादन एवं सेवा के स्वच्छ एवं अधिक हरित स्वरूपों की ओर मुड़ने की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है।

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