कार्यशील महिलाओं से संबंधित मुद्दे (Working Women’s Issues)

इसमें आप पढ़ेंगे

लैंगिक वेतन असमानता (Gender Pay Disparity)

विश्व बैंक रिपोर्ट ने कार्यस्थल पर भर्ती एवं वेतन, दोनों मामलों में महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैये की ओर संकेत दिया।

संबंधित डेटा

वैश्विक स्तर पर 2017 में महिलाओं में बेरोजगारी दर 6.2% थी, जबकि पुरुष बेरोजगारी दर 5.5 प्रतिशत थी

भारत में विद्यमान हैं:

  • संपत्ति पर निम्न अधिकार: महिलाएं कृषि श्रम में लगभग 40% योगदान करती हैं, परंतु मात्र 9% भूमि पर उनका
    स्वामित्व है।
  • वित्तीय निर्भरताः महिलाओं की लगभग आधी आबादी के पास स्वयं के उपयोग के लिए बैंक या बचत खाते नहीं हैं तथा
    60% महिलाओं के नाम पर कोई मूल्यवान संपत्ति नहीं है।
  • निम्न आर्थिक गतिविधिः सकल घरेलू उत्पाद में महिलाओं का योगदान केवल 17% है, जबकि वैश्विक औसत 37% है।
  • 2017 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) सर्वेक्षण में भी भारत की महिला श्रमशक्ति भागीदारी (Female Labour
    Force Participation -FLFP) दर को 131 देशों में 121वां स्थान दिया गया था।
  • व्युत्क्रम रुझान (Reverse Trend): हालांकि 2004 से 2011 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में 7% की वृद्धि दर्ज हुई
    तथापि देश की श्रमशक्ति में महिला भागीदारी में वृद्धि होने के बजाय 35% से 25% तक की गिरावट आई थी।
  • विश्व आर्थिक मंच की “ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2017” में भी भारत को अत्यंत निम्न (108वां) स्थान प्राप्त हुआ था।
  • मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स, 2018 के अनुसार, भारत में महिलाओं की आय पुरुषों की तुलना में 20% कम है।

मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स (Monster Salary Index MSI), 2018

  •  इसके अनुसार, भारत में महिलाओं की आय पुरुषों की तुलना में 20% कम है।
  • यद्यपि, लैंगिक वेतन अंतराल में 2016 के 24.8% में लगभग 5% की कमी आई है। साथ ही 3-5 वर्ष के अनुभव समूह में मामूली रूप से व्युत्क्रमित वेतन असमानता विद्यमान थी, जहां महिलाओं की आय पुरुषों की अपेक्षा अधिक थी।

कामकाजी महिलाओं के समक्ष चुनौतियां

  • कानूनी प्रतिबंधः अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के एक अध्ययन के अनुसार, 143 अर्थव्यवस्थाओं में से लगभग 90% में कम से कम एक महत्वपूर्ण, लिंग-आधारित कानूनी प्रतिबंध विद्यमान है।
  • पितृसत्तात्मक दृष्टिकोणः 2011 के NSSO डेटा के अनुसार उच्च जातियों तथा उच्च आय वाले परिवारों की महिलाएं घर के बाहर कम काम करती हैं।
  • 2012 के “औपचारिक क्षेत्र में लिंग वेतन असमानता” रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की आयु, कार्य अनुभव, शैक्षिक योग्यता एवं व्यावसायिक पदानुक्रम में वृद्धि के साथ वेतन में असमानता भी बढ़ती है।

शिक्षा में महिलाओं के दाखिलों में वृद्धिः कुछ शोधों के अनुसार, FLFP में हालिया गिरावट के लिए एक व्यावहारिक स्पष्टीकरण यह है कि हाल में माध्यमिक शिक्षा में विस्तार तथा भारत में तेजी से बदल रहे सामाजिक मानदंड के कारण कामकाजी आयु वर्ग की युवा महिलाएं (15 से 24 वर्ष) श्रमशक्ति में शीघ्र सम्मिलित होने के बजाय अपनी शिक्षा जारी रखने का विकल्प चुन रही हैं।

  • देश में पक्षपातपूर्ण मानव पूंजी मॉडल, जो कौशल, शिक्षा एवं अनुभव में लैंगिक अंतरों पर केंद्रित है। 
  • कार्यस्थल असुरक्षाः भारत में महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों की दर 53.9% है।
  • अन्य चुनौतियां: आकर्षक रोजगार विकल्प एवं आय सुरक्षा का अभाव, अपर्याप्त यात्रा एवं परिवहन सुविधाएं, लंबे समय तक काम करने वाली महिलाओं के प्रति सामाजिक धारणा, कार्यस्थल पर क्रैच सुविधा का अभाव आदि।

आगे की राह

  • महिलाओं के लिए बेहतर नौकरी के अवसर सृजित करने तथा श्रम कानूनों को व्यवस्थित करने के लिए श्रमशक्ति का औपचारीकरण
  • कौशल विकासः महिलाओं में विपणन योग्य कौशल तथा बेहतर निर्णय लेने की क्षमताओं को विकसित करने में सहायता हेतु व्यावसायिक एवं तकनीकी प्रशिक्षण, जीवन कौशल एवं वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम।
  • मातृ अवकाश के बजाय माता-पिता को अवकाश अनिवार्य करने की पहल शिशु जन्म के पश्चात पुनः श्रमशक्ति का हिस्सा बनने में महिलाओं की सहायता करेगी तथा पुरुषों को शिशु की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रोत्साहित करेगी।
  • कंपनियों द्वारा उठाए गए कदमः कॉर्पोरेट इंडिया को वेतन अंतराल को समाप्त करने, स्वस्थ कार्य संस्कृति को लेकर कर्मचारियों की धारणा को बदलने तथा समान अवसरों को बढ़ावा देने के लिए व्यावहारिक नीतियों को बढ़ाने तथा उन्हें कार्यान्वित करने की आवश्यकता है।

भारत में लैंगिक अंतराल समाप्त करने के लिए उठाए गए कदम

संवैधानिक

DPSP के तहत अनुच्छेद 39(d): इसके अनुसार, राज्य विशेष रूप से पुरुष एवं महिलाओं, दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करने के लिए नीतियों को निर्देशित करेगा।

न्यायिक 

रणधीर सिंह बनाम भारत संघ तथा गृह कल्याण केंद्र बनाम भारत संघः सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ का सिद्धांत संवैधानिक लक्ष्य है तथा इस प्रकार यह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत प्रवर्तनीय है।

विधायी 

  • समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976: इस अधिनियम का उद्देश्य पुरुष तथा महिला कर्मचारियों को समान पारिश्रमिक प्रदान करना तथा रोजगार एवं रोजगार के अवसरों से संबंधित सभी मामलों में लैंगिक आधार पर भेदभाव को रोकना है।
  • प्रसव अवकाश की अवधि को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह करने हेतु 2017 में मातृत्व लाभ अधिनियम में संशोधन किया गया था।
  • कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध व निवारण) अधिनियम, 2013 (SHW Act): यह अधिनियम विशाखा दिशा-निर्देशों को कार्यान्वित करने तथा महिलाओं के लिए एक सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करने के लिए अधिनियमित किया गया था।
  • अन्य कदमः सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों की सहायता हेतु भारत सरकार की मुद्रा योजना (MUDRA Scheme) तथा महिलाओं को सशक्त बनाने हेतु जन धन योजना के अंतर्गत प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण। मुद्रा योजना के तहत उधारकर्ताओं की कुल संख्या का लगभग 78% हिस्सा महिला उद्यमी हैं।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment at Workplace)

  • कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के कार्यान्वयन पर एक समीक्षा बैठक आयोजित की गयी।
  • इस दौरान यह परिलक्षित हुआ कि इस अधिनियम को लागू करने के तरीके एवं कार्यान्वयन के परिणामों के सन्दर्भ में कई कमियाँ विद्यमान थीं।
  • इस अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1997 में दिए गये निर्णय (जिसे विशाखा दिशानिर्देश के नाम से जाना जाता है) को शामिल किया गया है। इस निर्णय में नियोक्ता द्वारा कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न के मापदंड को तय करने की आवश्यकता को प्रदर्शित किया गया है।

कार्यान्वयन के मुद्दे

  • 70% महिलाएं अपने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा किये गए यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट दुष्परिणामों के भय से दर्ज नहीं करवाती
  • 2015 में किये गये एक शोध के अनुसार, 36% भारतीय कंपनियों और 25% बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अभी तक आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee: ICC) का गठन नहीं किया गया है, जबकि अधिनियम के अंतर्गत इस समिति का गठन अनिवार्य है।
  • अदालत में लंबे समय तक मामलों के लंबित रहने के कारण पीड़ित की समस्याओं में वृद्धि होती है।
  • अधिनियम में इस बात का उत्तरदायित्व तय नहीं किया गया है कि कार्य स्थल पर अधिनियम का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभारी कौन होगा।

बेहतर कार्यान्वयन के लिए प्रस्तावित कदम

  • महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी की अध्यक्षता में एक अंतर-मंत्रालयी समिति की स्थापना की जाएगी।
  • यह समिति यौन उत्पीड़न की शिकायतों के निपटान की प्रगति की समीक्षा तथा एक मानकीकृत प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करेगी।
  • समिति यह भी सुनिश्चित करेगी कि सभी मंत्रालयों/विभागों की आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee: ICC) के प्रमुखों को शिकायतों के बेहतर निपटारे को सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाए।
  • महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा इस अधिनियम के तहत सरकार की किसी भी महिला कर्मचारी की शिकायत दर्ज करने के लिए एक सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक मंच की स्थापना की जाएगी।
  • यह अधिनियम के तहत एक पारदर्शी एवं अनुवीक्षण योग्य शिकायत निवारण तंत्र को सक्षम बनाएगा।
  • प्राप्त शिकायतों, उनके निपटान तथा लंबित मामलों एवं कार्यवाहियों की संख्या पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को मासिक रिपोर्ट देना।

यह भी निर्णय लिया गया कि अधिनियम में निहित एक महिला अधिकारी के अधिकारों और ICC की जिम्मेदारियों के विषय में मंत्रालयों/विभागों/संलग्न कार्यालयों की वेबसाइटों सहित विभिन्न तरीकों के माध्यम से पर्याप्त प्रचार किया जाना चाहिए।

यौन उत्पीड़न अधिनियम के प्रावधान

  • यह अधिनियम सभी आयु वर्ग और रोजगार स्तर से सम्बंधित महिलाओं को शामिल करते हुए पीड़ित महिला की परिभाषा को विस्तृत रूप से व्याख्यायित करता है। इसके अंतर्गत क्लाइंट्स, ग्राहकों तथा घरेलू कामगारों को भी शामिल किया गया है।
  • इसमें ‘कार्यस्थल’ के अर्थ को विस्तृत करते हुए पारंपरिक कार्यालयों के साथ अन्य सभी प्रकार के संगठनों को भी शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त यह गैर-पारंपारिक कार्यस्थल (उदाहरण के लिए दूरसंचार के क्षेत्र में शामिल) और कर्मचारियों द्वारा कार्य के लिए दौरा किये जाने वाले कार्यस्थल को भी शामिल करता है।
  • यह ‘आंतरिक शिकायत समिति’ (ICC) के गठन को अनिवार्य बनाता है तथा किसी संगठन द्वारा ICC का गठन नहीं किये जाने पर उचित कार्रवाई का प्रावधान भी करता है।
  • इसमें प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक वर्ष की समाप्ति पर पूरे वर्ष के दौरान की गई शिकायतों की संख्या और कार्रवाई की संख्या की लेखापरीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
  • इस अधिनियम द्वारा नियोक्ता के कर्तव्यों की सूची भी जारी की गई है, जैसे अधिनियम के बारे में कर्मचारियों को शिक्षित करने के लिए नियमित कार्यशालाओं और जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करना।
  • यदि नियोक्ता ICC का गठन करने में विफल रहता है या अधिनियम के किसी अन्य प्रावधान का पालन नहीं करता है, तो उन्हें 50,000 रुपये का जुर्माना देना होगा। यदि अपराधी दोबारा वही अपराध दोहराता है, तो दंड दोगुना हो जाता है। दूसरी बार किये गए अपराध में उसके लाइसेंस को रद्द करने या रीन्यू (renew) न करने का प्रावधान भी किया गया है।

महिला आरक्षण विधेयक (Women Reservation Bill)

सरकार संसद में महिला आरक्षण विधेयक पेश करने पर विचार कर रही है, जिसके द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित हो जाएँगी।

राज्य स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व

  • राज्य स्तर पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति गंभीर है। राज्यों में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व अनुपात लगभग7% है।
  • उदाहरण के लिए नागालैंड या मिज़ोरम में कोई भी महिला विधायक नहीं हैं। अन्य निम्नतम महिला प्रतिनिधित्व वाले राज्य जम्मू और कश्मीर (2.27%), गोवा (2.5%) और कर्नाटक (2.65%) हैं।
  • भारत में सबसे अधिक महिला प्रतिनिधियों वाला राज्य हरियाणा (14.44%) है, उसके बाद पश्चिम बंगाल (13.95%), राजस्थान (13.48%) और बिहार (11%) हैं।

पृष्ठभूमि

  • विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारणों और पितृसत्तात्मक परंपराओं के कारण महिलाएँ ऐतिहासिक रूप से सामाजिक बहिष्कार की स्थिति में रहीं हैं। इसके कारण स्वतंत्रता के 70 वर्ष पश्चात् भी देश की राजनीतिक एवं निर्णय निर्माण प्रक्रिया में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हुआ है।
  • लोकसभा में महिलाओं का अनुपात 1951 में 4.4% से बढ़कर 2014 में 11% हुआ है। इस गति से लैंगिक संतुलन की स्थिति प्राप्त करने में 180 वर्ष लग जाएँगे। महिलाओं को सक्रिय बनाने में पंचायत में दिया गया आरक्षण, अपेक्षा से अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ। इसके द्वारा उच्च निकायों ,जैसे राज्य विधानमंडलों और संसद में आरक्षण की आवश्यकता को बल मिला है।
  • लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% स्थानों को आरक्षित करने के उद्देश्य से राज्यसभा में संविधान संशोधन (108वां संशोधन) विधेयक प्रस्तुत किया गया। हालांकि, 15वीं लोकसभा के विघटन के साथ ही यह विधेयक समाप्त हो गया।

विधेयक की मुख्य विशेषताएँ

  •  इसके द्वारा लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों को आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है।
  • संसद द्वारा निर्धारित प्राधिकारी द्वारा इन आरक्षित सीटों का आवंटन किया जायेगा।
  • लोकसभा और विधान सभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित कुल सीटों का एक तिहाई इन समुदायों की महिलाओं के लिए आरक्षित होगा।
  • राज्य या केंद्रशासित प्रदेश में अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में नियमित आवर्तन (Rotation) द्वारा आरक्षित सीटें आवंटित की जाएँगी।
  • इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 वर्ष पश्चात् महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण समाप्त हो जाएगा।

गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति (1996) की अनुशंसाएँ

  • 15 वर्ष की अवधि के लिए आरक्षण।
  • एंग्लो-इंडियंस के लिए उप आरक्षण (sub-reservation) को शामिल करना।
  • जिन राज्यों में लोकसभा में सीटें तीन से कम है (या SC/ST के लिए तीन से कम सीटें है), वे भी आरक्षण में शामिल हैं।
    दिल्ली विधान सभा में भी आरक्षण संबंधी प्रावधान लागू होगा।
  • राज्यसभा और विधान परिषदों में सीटों का आरक्षण।
  • संविधान द्वारा आरक्षण व्यवस्था को OBC तक विस्तारित करने के पश्चात्, OBC महिलाओं के लिए उप-आरक्षण प्रदान किया जाए।

महिला विधेयक में, पहली चार सिफारिशों को शामिल किया गया व अंतिम दो को छोड़ दिया गया था।

संसदीय स्थायी समिति (2008) की सिफारिशें

  • प्रत्येक राजनीतिक दल को अपने कुल टिकटों का 20% महिलाओं को वितरित करना होगा।
  • वर्तमान में भी, कुल सीटों का 20% से अधिक आरक्षित नहीं होना चाहिए।
  • OBC और अल्पसंख्यकों से संबंधित महिलाओं के लिए एक हिस्सा निर्धारित होना चाहिए।
  • राजनैतिक दलों द्वारा सीटों के एक न्यूनतम प्रतिशत के लिए महिलाओं को नामांकित करना आवश्यक होगा।
  • द्विसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों का निर्माण किया जाना चाहिए, एवं ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में दो सीटों में से एक सीट महिला के लिए आरक्षित होगी।

चुनौतियाँ

  • स्थानीय और विविध परिस्थितियों का आंकलन किये बिना, केंद्र द्वारा सभी के लिए एक समान रूप से निर्मित नीतियाँ कारगर नहीं रही हैं। नागालैंड में स्थानीय निकायों में आरक्षण और अनुच्छेद 371 (A) के तहत वहाँ की अद्वितीय संस्कृति को संरक्षित करने हेतु प्रदान किये गए संवैधानिक संरक्षणों के बावजूद नागालैंड में होने वाले आंदोलनों से यह तथ्य स्पष्ट होता है।
  • महिलाओं को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा के अयोग्य ठहराने वाला: यह महिलाओं की असमानता की स्थिति को बनाए रखेगा क्योंकि
    उन्हें योग्यता के आधार पर प्रतिस्पर्धा योग्य नहीं माना जाएगा।
  • महत्वपूर्ण मुद्दों से भटकाव: इस नीति के कारण चुनाव सुधार संबंधी बड़े मुद्दों, जैसे कि राजनीति का अपराधीकरण और दलों
    में आंतरिक लोकतंत्र, से ध्यान भटकता है।
  • चयन का अधिकार : संसद में सीटों का आरक्षण, मतदाताओं के लिए केवल महिला उम्मीदवारों का ही विकल्प उपलब्ध करवाता है।
  • भाई-भतीजावाद/पक्षपात को बढ़ावा : जिन राजनीतिज्ञों का निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत आता है, आरक्षण द्वारा केवल उनकी पत्नियों एवं बेटियों को बढ़ावा मिल सकता है, जो विधेयक के उद्देश्य के विपरीत है।
  • प्रधान/सरपंच पति सिंड्रोम: पुरुष अपनी निर्वाचित पत्नियों के कार्यों को अनुचित रूप से प्रभावित करते हैं।

प्रासंगिकता

  • राजनीतिक सशक्तिकरण: महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण, निर्णय/नीति निर्माण प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने का अनिवार्य कानूनी प्रयास है। यह महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को सुनिश्चित करेगा तथा प्रस्तावना एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 38 में प्रस्तावित, राजनीतिक न्याय की उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त करेगा।
  • सामाजिक सशक्तिकरण : संसद और राज्य विधानसभा में महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व, सभी स्तरों पर महिलाओं के पिछड़ेपन का प्राथमिक कारक है। अतः महिलाओं को सामाजिक-लैंगिक बाधाओं को पार करने और उनके समकक्षों के समान स्तर/समान अवसर दिलाने के लिए आरक्षण की आवश्यकता है।
  • समानता प्राप्त करने के लिए : अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों से संबंधित महिलाओं के लिए आरक्षण की आवश्यकता है, ताकि वे उच्च जातियों की महिलाओं के साथ उचित प्रतिस्पर्धा कर सकें।
  • सच्चे लोकतान्त्रिकरण के लिए: आरक्षण एक समाजशास्त्रीय अवधारणा है, जिसका जन्म लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को समावेशी बनाने और सोशल री-इंजीनियरिंग की प्रक्रिया को संपन्न करने दौरान हुआ है। नीति निर्माण तंत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व, राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है।

पंचायत में आरक्षण के सकारात्मक प्रभाव :

  • पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए 1/3 सीटों के आरक्षण के माध्यम से वे अर्थपूर्ण योगदान करने में सक्षम हुई हैं। पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं का वास्तविक प्रतिनिधित्व 42.3% यानी आरक्षण प्रतिशत से अधिक हो गया है।
    इसने सरकार को स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए प्रेरित किया है।
  • पंचायतों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व और प्रदर्शन, मुख्यतः उनके लिए सीटों के सांविधिक आरक्षण के कारण सुनिश्चित हो
    सका है।

पंचायत चुनावों में आरक्षण

  • संविधान संशोधन (73वें और 74वें संशोधन) के माध्यम से पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण, महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
  • 1993 में संविधान के 73वें और 74वें संशोधन कानून के अनुसार, सभी ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में एक तिहाई
    सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
  • हालांकि, 16 राज्यों में ऐसे कानून हैं, जो महिलाओं के लिए ग्रामीण स्थानीय निकायों में 50% सीटें आरक्षित करते हैं।

आगे की राह

  • उच्च सदन में आरक्षण प्रदान करना: संविधान के तहत संसद और राज्य विधान मंडलों के उच्च सदन को समान रूप से
    महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की गयी है। अतः, राज्य सभा एवं विधान परिषदों में महिलाओं को आरक्षण प्रदान करने के संबंध में भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि समानता के सिद्धांत को लागू करते हुए, महिलाओं को भी संसद के तथा राज्य विधान मंडलों के द्वितीय या उच्च सदन में पर्याप्त स्थान मिल सके।
  • समाज का समावेशी विकास : यह प्रमाणित है कि राजनीतिक आरक्षण ने, आरक्षण से लाभान्वित समूहों के पक्ष में संसाधनों के पुनर्वितरण को बढ़ावा दिया है। इस प्रकार, चुनी हुईं महिलाएँ महिला मुद्दों से सम्बंधित सार्वजनिक संसाधनों में अधिक निवेश करती हैं।
  • संविधान के सिद्धांत की रक्षा के लिए: विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के मुद्दे को राजनीतिक दलों के विवेक पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। अपितु इसे संविधान के तहत सुनिश्चित किया जाना चाहिए तथा सभी संभव तरीकों से कार्यान्वित भी किया जाना चाहिए।
  • एक प्रारंभिक कदम के रूप में विधेयक: विधेयक एक मात्र समाधान नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को प्राप्त करने का एक साधन मात्र है। विधेयक केवल राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण के लिए सिद्धांत/मूल रूपरेखा को स्पष्ट करता है।

प्रादेशिक सेना (TA) में महिलाएं (Women in Territorial Army)

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में केंद्रीय अधिसूचना को रद्द करते हुए TA इकाइयों में महिलाओं को सम्मिलित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।

सम्बंधित तथ्य:

  • प्रादेशिक सेना अधिनियम, 1948 की धारा 6 के अंतर्गत प्रादेशिक सेना में नामांकन हेतु पात्रता संबंधी नियमों को परिभाषित किया गया है। प्रादेशिक सेना को नियमित सेना (regular army) के बाद रक्षा की दूसरी पंक्ति (second line of defence) के रूप में भी जाना जाता है।
  • नियमों के अनुसार, TA द्वारा अधिकांशतः पुरुषों को भर्ती किया गया, जिससे सेना की इन्फेंट्री यूनिट्स में महिलाएँ प्रवेश से वंचित हुई हैं।
  • संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर एक जनहित याचिका में दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष दावा पेश किया गया कि महिलाओं को सम्मिलित होने की अनुमति न देना एक “संस्थागत भेदभाव” है तथा यह संविधान की भावना के विरुद्ध भी है।

दिल्ली उच्च न्यायालय का अवलोकन

  • उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों की पीठ के अनुसार TA में महिलाओं के नामांकन पर प्रतिबंध की नीति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 19 (1) (G) के विरुद्ध है।
  • न्यायालय ने यह भी माना कि धारा 6 में वर्णित किसी भी व्यक्ति’ में पुरुष और महिला दोनों शामिल होंगे।

गंगा सफाई उद्देश्य हेतु केंद्र सरकार द्वारा एक प्रादेशिक सेना (TA) बटालियन की स्थापना को भी मंजूरी दी गई है।

  • यह पहल ‘गंगा की सफाई हेतु राष्ट्रीय मिशन’ (national mission to clean Ganga) के तहत 2020 तक गंगा को साफ करने के उद्देश्य से की गयी है।
  • टास्क फोर्स में भूतपूर्व सैनिक सम्मिलित होंगे तथा इसका मुख्यालय इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थापित किया जायेगा।
  • जल संसाधन मंत्रालय, नदी विकास और गंगा कायाकल्प मंत्रालय द्वारा योजना का वित्त पोषण किया जायेगा।
  • नमामी गंगे कार्यक्रम के तहत पर्यावरण संबंधी विशिष्ट परियोजनाओं के संचालन हेतु अभी तक TA के नौ पारिस्थितिक कार्यबल (ecological task force-ETF) बटालियनों का निर्माण किया गया है।

टास्क फोर्स द्वारा निम्नलिखित कार्य किये जाएंगे:

  • जन-जागरूकता अभियानों का प्रबंधन करना।
  • जैव विविधता के संरक्षण हेतु नदी के संवेदनशील क्षेत्रों की पेट्रोलिंग करना।
  • नदी प्रदूषण के स्तर को निश्चित मानक स्तर तक बनाए रखना।
  • प्रदूषण नियंत्रण उपायों को लागू करवाने में सरकार की सहायता करना।
  • घाटों के प्रबंधन में स्थानीय नागरिक प्रशासन और पुलिस का समर्थन करना।
  • उक्त क्षेत्र में बाढ़ या प्राकृतिक आपदा के समय सहयोग एवं सहायता प्रदान करना।

सुरक्षा बलों में महिलाओं का समावेश

सकारात्मक पक्ष

  • योग्यता लिंग विशिष्ट नहीं है-उचित प्रशिक्षण के पश्चात महिला सैनिकों को भी पुरुषों के समान सक्षम पाया गया है। वैसे भी, 21 वीं सदी के युद्ध प्रायः तलवारों और बंदूकों के साथ नहीं लड़े जाते।
  • आवेदकों की संख्या बढ़ने से उम्मीदवारों का एक बड़ा और बेहतर समूह प्राप्त हो सकता है।
  • प्रभावशीलता- महिलाओं पर पूर्णतः प्रतिबंध, सबसे अधिक सक्षम व्यक्ति को नौकरी के लिए चुनने की कमांडरों की क्षमता को सीमित करता है।

नकारात्मक पक्ष

  • युद्ध हेतु महिलाओं की शारीरिक अक्षमता उन्हें सेना में शामिल किये जाने के विरुद्ध सर्वाधिक सामान्य उदाहरण है।
  • सहयोगियों द्वारा दुर्व्यवहार तथा शत्रु द्वारा बंदी बना लिए जाने की स्थितियां इस मुद्दे के सम्बन्ध में एक नैतिक चुनौती उत्पन्न करती हैं।
  • पारंपरिक मानसिकता और विश्वास, खासकर रक्षा संबंधी प्रतिष्ठानों में, जहां पुरुषों को महिलाओं के पद और उनके आदेश को स्वीकार करने में आज भी समस्याएं हैं।

रक्षा बलों में महिलाओं की वर्तमान स्थिति:

  • भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना ने विभिन्न विभागों में महिलाओं को अनुमति दी है, परन्तु वर्तमान में भी युद्ध संबंधी भूमिका में उनका प्रवेश प्रतिबंधित है।
  • 2015 में भारतीय वायुसेना और भारतीय नौसेना तथा 2017 में भारतीय थल सेना ने विभिन्न पश्चिमी देशों से प्रेरणा लेते हुए महिलाओं को युद्ध संबंधी भूमिका निभाने की अनुमति प्रदान कर दी। इसके अतिरिक्त रक्षा बलों में लैंगिक समानता लाने हेतु प्रयास किया जा रहा है।

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